बूँद बूँद था स्नेह बटोरा बरसों तक मैंने अपने हाथ जलाये उनके घावों को भरने एक पल में यूँही लगता सब गया बिखर माँ पापाजी के बाद का हमारा स्रेह बंधन जो सोचा था और अधिक जाएगा निखर स्वार्थ और लालच की आई आँधी ऐसी तिनका तिनका हुवा सभी कुछ तितर बितर प्रेम का धागा टूटे तो जुड़ जाए, चाहे गाँठ पड़े प्रेम का घड़ा फूटे तो उसका कोई क्या करे बह गया सारा सिंचित स्नेह 'अर्थ प्रेम' की नाली में दुनिया का सबसे प्यारा रिश्ता, बदल गया गाली में । किससे कहूँ ये प्रखर दुःख दर्द मैं अपना केवल चाहूँ कोई तो सुनले मेरा कहना हल्का करलूँ अपनों से जो मिला, दर्द अपना व्यथा इतनी, कि भूला प्रभु का नाम जपना अपनों का दिया दर्द, किसी से कह ना सका आँखें सूखी थीं उनके जरिये भी बह ना सका मेरा दिल का दर्द, मेरे दिल की हद तक रह गया प्रभु की बड़ी कृपा है, मैं ये गहरा सदमा सह गया जो किसी से कह ना पाया इन शब्दों में कह गया मेरे अंतस का दुःख दर्द मेरी कविता में बह गया ।
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