जब बात स्वाभिमान पर आ जाए फिर वह बन जाए नारी से काली जी बात बात पर लड़ना उसे आता था कुछ खास नही हो तुम यह कहना हर पल आता था... सिसक सिसक कर बात उसकी चुभ गई थी अँखियों से अश्रू की धारा बह रही थी कब तक चुप रह कर सुनती उसके जुल्मों को , हाथ उठा उठा कर लड़ने लग गए वो... अब रुकने का मन नहीं करता अपने आप से कहने लगी वह,कब तक ज़ुल्म सहेगी ,सब इतना जुल्म जो करते है;" क्या इन्हें भगवान से डर नही लगता"... समझा समझा कर थक गई वह पर उनको सुनने का मन नही करता इसलिए उसने मन में सोचा अब सबर का बाँध टूट गया.... जो जुल्म उसने किया नहीं फिर वह क्यों किसी के जुल्म सहे इसी बात से वह उठ खड़ी अपने स्वाभिमान को बचाने फिर उसने अपनी शक्ति पहचान ली नारी से काली बनने में अब देर नहीं ॥ ©®Malwinder kaur (Malwin)
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