स्वाभिमान की बात

जब बात स्वाभिमान पर आती है, सारे लाभ नगण्य हो जाते है। चाहे कोई कितना अपना अपना हो, मां बाप या अपनी बहना हो, सगा भाई, दोस्त या रिश्तेदार हो। जब चोट स्वाभिमान को लगती है, दिल का हर कोना चोटिल हो जाता है, फिर कोई बात कोई सफाई काम ना आती है, ना टीस ना पीड़ा कम कर पाती है। ना ये जख्म भर पाता है, सबसे अलग थलग पड़ जाता है। जब बात स्वाभिमान पर आती है, कितने भी अशक्त कोई क्यों ना हो, चाहे हाथ में उसके कुछ भी ना हो, पर.. वो सबसे लड़ जाता है, कोई उसको रोक ना पाता है। स्व को साबित कर जाता है, जब बात स्वाभिमान पर आती है। हर ओर फतह मिल जाती है।

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: निर्मेश
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