एक दिन शिवजी कैलाश पर्वत पर तांडव कर रहे थे। अचानक पर्वती जी वहाँ आती हैं और शिवजी से कुछ पूछती हैं। पर्वती जी कहती हैं, "प्रभु, हमारे मन में कब से एक सवाल है और हम उस पर चिंतित हैं। क्या मैं आपसे वह सवाल पूछ सकती हूँ?" शिवजी कहते हैं, "हाँ, बिल्कुल पूछ सकती हो पार्वती। बताइए, क्या सवाल है आपका जो आपको उलझन में डाल रहा है?" **पार्वती जी:** "मेरा सवाल तो यह है कि आपने इस दुनिया में दो तरह के लोग क्यों बनाए हैं?" **शिवजी:** "क्या? दो तरह के लोग? बताइए, वे कौन से हैं भला?" **पार्वती जी:** "जी हां, दो तरह के। और वे हैं 'पहला गरीब और दूसरा अमीर।' ऐसा क्यों किया आपने?" **शिवजी:** "नहीं पार्वती, हमने कोई दो तरह के लोग नहीं बनाए। हमने तो सिर्फ उन्हें इंसान बनाकर भेजा है। वे लोग वहां जाकर अमीर और गरीब बन चुके हैं।" **पार्वती जी:** "वो कैसे भला, प्रभु? ज़रा हमें भी बताइए।" **शिवजी:** "बताना नहीं पार्वती, बल्कि मैं आपको दिखाऊंगा। आप यहीं रहकर देखिए।" इसके बाद शिवजी कैलाश पर्वत से भुलोक पर जाते हैं, और वह भी एक साधु के रूप में। **भुलोक पर:** शिवजी एक छोटे से गाँव में पहुँचते हैं, जहाँ एक घर होता है। उस घर में एक पति और पत्नी रहते हैं। वह घर बहुत ही गरीब होता है, और पति रोज़ बाहर से आकर शराब पीता है और अपनी पत्नी को पीटता है। दोनों बहुत गरीब होते हैं। शिवजी उनके घर एक साधु के रूप में पहुँचते हैं। **साधुजी:** "भिक्षा दो, रेती! भगवान आपका भला करेंगे। भिक्षा दो..." **पत्नी:** "स्वामी, मेरे पास कुछ भी नहीं है जो आपको दे सकूँ, पर आप यहाँ भोजन कर सकते हैं।" वह साधुजी को अंदर बुलाकर भोजन कराती हैं। **साधुजी:** "मैं यहाँ भोजन करके बहुत प्रसन्न हूँ। मैं आपको तीन वरदान देता हूँ। बताइए, आपको क्या चाहिए? आप जो भी माँगेंगे, वह आपको मिलेगा।'' **पत्नी:** "साधुजी, मेरा पति रोज़ शराब पीकर मुझे बहुत मारता है। कृपया आप उन्हें बंदर बना दीजिए।" साधुजी बिना कुछ सोचे-समझे तुरंत वरदान देते हैं: **साधुजी:** "तथास्तु।" उसका पति तुरंत बंदर बन जाता है। और बंदरों की जगह तो आप जानते ही हैं, वे जंगल में रहते हैं, तो वह भी जंगल में चला जाता है। दो, तीन, चार दिन बीत जाते हैं। जैसा कि आप जानते हैं, पति-पत्नी का रिश्ता ऐसा होता है कि वे एक-दूसरे के बिना अधिक समय तक नहीं रह सकते। पत्नी सोचती है और कहती है... **पत्नी रोते हुए कहती है:** "साधुजी, मेरा केवल एक ही वरदान पूरा हुआ है। अब दो वरदान बाकी हैं।" **साधुजी:** "ठीक है, दूसरा वरदान मांगो।" **पत्नी:** "पर साधुजी, जैसे आपने मेरे पति को बंदर बनाया था, ठीक वैसे ही मुझे भी बंदरिया बना दीजिए, क्योंकि मुझे अपने पति के साथ ही रहना है।" साधुजी फिर से बिना कुछ सोचे-समझे वरदान देते हैं: **साधुजी:** "तथास्तु।" और उसकी पत्नी भी बंदरिया बन जाती है। वह भी अपने पति के पास जंगल में चली जाती है। **सारांश:** और फिर वे दोनों, पति और पत्नी, मिलकर जंगल में खाना और पानी की तलाश में भटकते रहते हैं। कुछ महीनों तक उन्हें खाना और पानी मिलता है, लेकिन जब गर्मी का मौसम आता है, तो सारा पानी सूख जाता है और कहीं भी खाना नहीं मिलता। गर्मी में भोजन मिलना मुश्किल हो जाता है। तब वे बंदर और बंदरिया जंगल के पास के गाँव में चले जाते हैं। वहाँ उन्हें एक पानी की टंकी दिखाई देती है, और वे पानी की तरफ बढ़ते हैं। लेकिन, जैसा कि आप जानते हैं, गाँव के बच्चे बहुत शरारती होते हैं... जब भी कोई बंदर या बंदरिया गाँव में दिखाई देते हैं, तो गाँव के बच्चे उनसे खेलना शुरू कर देते हैं, पत्थरों से मारते हैं और उन्हें चिढ़ाने लगते हैं। इससे परेशान होकर, बंदर और बंदरिया दोनों वहां से भागकर फिर से जंगल में चले जाते हैं। वहां, बंदरिया कहती है, "साधुजी, मेरे तो सिर्फ दो ही वरदान पूरे हुए हैं, और एक वरदान अभी बाकी है।" **बंदरिया:** "साधुजी, मेरा तो सिर्फ दो ही वरदान हुए हैं और एक वरदान बाकी है।" **साधुजी:** "अब बताओ, क्या चाहिए?" **बंदरिया:** "हम दोनों को फिर से पहले जैसे इंसान बना दीजिए, जैसे हम पहले थे। हमें वापस उसी हाल में ले चलिए।" साधुजी बिना कुछ सोचे-समझे फिर से वरदान देते हैं: **साधुजी:** "तथास्तु।" और वे दोनों, बंदर और बंदरिया, फिर से पति और पत्नी बनकर अपने घर पहुँच जाते हैं। इसके बाद साधुजी वहाँ से दूसरे गाँव की ओर, नदी की तरफ आगे बढ़ने लगते हैं। और वहां नदी के किनारे एक व्यक्ति उदास बैठा हुआ दिखाई देता है, और उसकी हालत बहुत ही खराब होती है। वह व्यक्ति बेहद गरीब होता है, और उसकी तीन समस्याएँ होती हैं: पहली, वह बहुत गरीब है; दूसरी, उसकी माँ देख नहीं सकती; और तीसरी, उसके संतान नहीं है। साधुजी उसके पास जाते हैं और कहते हैं: **साधुजी:** "भिक्षा दो, बेटा। भगवान आपका भला करेंगे। भिक्षा दो।" वह व्यक्ति अपनी जेब में हाथ डालता है और जो भी चवन्नी-अठन्नी निकलती है, वह साधुजी को भिक्षा में दे देता है। **गरीब व्यक्ति:** "साधुजी, मेरे पास जो भी था, मैंने दे दिया। अब मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं बचा।" **साधुजी:** "मैं तुम्हारी दानशीलता से बहुत प्रसन्न हूँ, बेटा। मैं तुम्हें एक वरदान दूँगा। बताओ, तुम्हें क्या चाहिए? सोच-समझकर मांगो, जो भी तुम मांगोगे, वह तुम्हें मिल जाएगा।" गरीब इंसान कुछ समय तक सोचता है और फिर कहता है: **गरीब इंसान:** "ठीक है, साधुजी।" साधुजी पूछते हैं, "क्या चाहिए तुम्हें?" **गरीब इंसान:** "साधुजी, "मेरी माँ अपने पोते को सोने के झूले में झूलता हुआ देख रही है।"** साधुजी फिर बिना कुछ सोचे-समझे वरदान देते हैं: **साधुजी:** "तथास्तु।" अब आप समझ ही गए होंगे कि सोने का झूला किसके घर में होता है। यह तो सिर्फ अमीर लोगों के घर में ही होता है। गरीब इंसान की माँ अपने पोते को, यानी गरीब इंसान के बेटे को, सोने के झूले में झूलता हुआ देखती है। गरीब इंसान को संतान भी मिल जाती है, और उसकी माँ, जो देख नहीं सकती थी, अब अपने पोते को सोने के झूले में झूलते हुए देख सकती है यानी उसकी माँ की आँखों की रोशनी भी लौट आती है। **मूल संदेश:** भगवान किसी को अमीर या गरीब नहीं बनाते हैं। इंसान अपनी समझ और कर्मों से ही अमीर या गरीब बनता है। शिवजी अपने असली रूप में आ जाते हैं और पार्वती जी से कहते हैं: **शिवजी:** "देखा पार्वतीजी, आपको याद है कि हमने एक गरीब को तीन वरदान दिए थे, लेकिन उसने उन वरदानों का सही उपयोग नहीं किया। वहीं, दूसरे गरीब को हमने सिर्फ एक वरदान दिया, और उसने उस वरदान का सही उपयोग किय| ! '' **शिवजी:** "उसने अपनी दुख और परेशानियाँ दूर कर लीं।" **पार्वती जी:** "हाँ, स्वामी, मुझे माफ कीजिए। मैं अपनी सोच में रह गई थी और मुझे नहीं पता था कि लोग अमीर और गरीब कैसे बनते हैं। मैंने बेवजह आप पर शक किया। कृपया मुझे माफ करें।" यह आपकी कहानी के लेखक विवरण के लिए है: **लेखक:** राठौड़ राहुल राज **स्थान:** महागांव, **तहसील:** नरनूर, **जिला:** आदिलाबाद, **राज्य:** तेलंगाना
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