वो बचपन की हसी, खामोशी में तबदीर हो जाती है। जब सर पर, जिम्मेदारियों की जंजीर बंध जाती हैं। किस्से-कहानियां जो बचपन में सुनाएं जाते हैं, बड़े होते ही वो शक्ल बदलकर सामने आते हैं। बड़े होकर ये बनोगे सिलसिला खूब सपने दिखाता है, और बड़े होते ही वो सपना चुबने लग जाता हैं। अब वो बड़े होने में बड़े वाली कोई बात नहीं हैं, कैसे कहूं और किसे...? कि मेरा बचपन मेरे साथ नहीं हैं। -kj -kj
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