हर समाज में कानून को इंसाफ की देवी की तरह देखा जाता है, जिसके हाथ में तराजू और आंखों पर पट्टी बंधी होती है। यह पट्टी इस बात का प्रतीक होती है कि कानून बिना भेदभाव के सबके साथ समान न्याय करेगा। परंतु, जब यह कानून अंधा हो जाए और उसकी तराजू झुकने लगे, तब समाज में अराजकता और अन्याय का बोलबाला हो जाता है। यही कहानी है 'अंधा कानून' की, जहां कानून की अंधी पट्टी अन्याय का साथ देने लगती है, और ईमानदार लोग इसकी गिरफ्त में आकर बेबस हो जाते हैं।
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