वो आंखें

कई बार आप अपने जीवन की परेशानियों में उलझे हुए रहते हैं। तब आपको समझ नहीं आता कि आप क्या करें। ऐसे में समय-समय पर आपको याद आती है अपनी वह डायरी जिसमें आपने अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को संजोकर रखा है। मैं भी शादी से पहले डायरी लिखती थी। पर शादी से कुछ दिन पहले ही मैंने उसे डायरी के कुछ पन्नों को फाड़ दिया। क्योंकि यह वह पन्ने थे जिन्हें मैंने अपने दिल की डायरी में स्थान दिया था। आज मैं अपनी इस फाड़े हुए पन्नों में से डायरी के एक आखिरी पन्ने की कहानी यहां पर सुनाने जा रही हूं। मैं उस कल्पना लोक से आई थी जहां पर मैंने अपने प्यार को अपने पति के लिए बचा कर रखा था। मैं हमेशा यही सोचती थी कि मैं सिर्फ उसी से प्यार करूंगी जिससे मेरी शादी होगी और मेरी शादी हो गई। शादी वाले दिन ही मुझे पता चल गया कि मेरी जिस व्यक्ति से शादी हुई उसका प्यार से दूर-दूर तक भी कोई वास्ता नहीं था। वह भी बहुत से आम हिंदुस्तानियों की तरह सिर्फ एक आदमी था और जिसे सिर्फ एक औरत चाहिए थी। या यह कहे की एक कठपुतली चाहिए थी‌।और मैं वह कठपुतली बन गई। मैंने अपने आप को बस इसी हाल में ढाल लिया था। पर क्या करूं थी तो एक इंसान ही ना। प्यार की जरूरत तो मुझे भी समय-समय पर महसूस होती थी। पर मैं उन संस्कारों का क्या करूं जो मुझे कैरक्टरलेस नहीं होने देते थे। बस फिर क्या अपनी यादों की डायरी उठाती और उन्हीं में से कोई ना कोई पन्ना खोल लेती थी। अपने चेहरे पर एक मुस्कान लाने के लिए। यादें मैं बस में सफर कर रही थी। उस वक्त मेरी उम्र कोई 23- 24 साल की रही होगी। मैं जॉब करती थी। और मुझे रोज ही बस से आना जाना पड़ता था। और शाम को लेट हो जाने के कारण मेरी बस में ही आंख लग जाया करती थी। यही सिलसिला बहुत समय तक चलता रहा। ज्यादातर में लॉन्ग रूट वाली बस ही पकड़ करती थी। क्योंकि वह रास्ते में छोटे-छोटे गांव में नहीं रुकती थी। पर जब मुझे लॉन्ग रूट की बस नहीं मिलती थी तब मैं लोकल बस पकड़ लिया करती थी। और ऐसा कई बार हो जाता था। और लोकल बस में भी मैं सोते-सोते ही सफर करती थी। तब एक दिन सोते-सोते बीच में ही मेरी आंख खुल गई। तब मैंने देखा एक लड़का मेरे साथ बैठा बस मेरी और देख रहा था। मुझे बहुत अजीब लगा। मैं थोड़ा असहज होने लगी। वह लड़का मुझसे चार-पांच साल छोटा दिखाई दे रहा था। मेरी और लगातार देख रहा था। और तभी मुझे बोला, आप बस में हमेशा सोती ही रहती हो। मुझे बड़ा अजीब लगा। तब मैं हल्का सा सर हिला दिया हां पर तुम्हें कैसे पता कि मैं हमेशा सोती हूं। तब उसका यह कहना था कि मैं हमेशा आपके साथ ही बैठता हूं। और मैं हैरान हो गई और मेरी नींद उड़ गई ,और मैं उसकी और देखने लगी। मुझे कुछ समझ नहीं आया कि मैं उससे क्या कहूं। बस यही कहा कि हां काम से सारा दिन बहुत थक जाती हूं और इसीलिए मुझे नींद आ जाती है। और ऐसा कहकर मैंने अपना मुंह दूसरी तरफ घूम लिया। तब अनएक्सपेक्टेडली वो अचानक ही बोला, मुझे आपसे कुछ कहना था। अब समझ नहीं आ रहा था वह क्या कहेगा। मैं सोच भी नहीं पा रही थी कि उस क्या कहना होगा। मैं पूछ लिया हां बोलो क्या कहना है। तब उसने कहा कि आप मेरे साथ कॉफी पीने चलोगे? क्या ???? कॉफी पीने तुम्हारे साथ? कहां? तब उसने जिस शहर से हम बस में चढ़ते थे उस शहर का नाम लिया। और वहां का एक खास रेस्टोरेंट था उसका नाम लिया। उसे देखकर यह तो मैं समझ गई थी कि वह एक स्टूडेंट है। तब मैंने उससे पूछ लिया तुम पढ़ते हो? उसने कहा हां। तब मैंने उससे उसके कॉलेज का नाम पूछा और उसने अपने कॉलेज का जो नाम बताया उसे सुनकर मेरे चेहरे पर एक स्माइल आ गई। फिर मैंने उसकी की क्लास पूछी। उसने बोला सेकंड ईयर। तब तो मेरे चेहरे पर हल्की सी हंसी ही आ गई। मैंने उससे कहा तुम जिस कॉलेज में पढ़ते हो मुझसे 4 साल छोटा भाई तुम्हारा सीनियर है। वह हल्का सा झेंप गया। फिर भी अपने चेहरे पर थोड़ा सा कॉन्फिडेंस लाते हुए बोला तो क्या हुआ? मैं आपको कुछ गलत नहीं बोल रहा बस आपके साथ एक कप कॉफी पीने का मन है। तब मैं हंसते हुए बोली थोड़ा सा डर भी था। तुम जो कह रहे हो वह पॉसिबल नहीं है। मैं तुम्हें जानती भी नहीं और अगर बाई चांस वहां मेरा भाई आ गया तो मैं उससे क्या बोलूंगी कि मैं किसके साथ कॉफी पी रही हूं। तुम समझ सकते हो कि ये ठीक नहीं है। वह मायूस हो गया अभी वह मुझसे और बात करना चाहता था पर उसका स्टॉपेज आ गया। बस से उतरने से पहले बार-बार एक ही लाइन रिपीट कर रहा था। प्लीज आप मेरे बारे में कोई गलत धारणा मत बनाना। मैं गलत लड़का नहीं हूं। मेरी कोई गलत इंटेंशन नहीं थी। प्लीज आप मुझे गलत मत समझना। सच में मैं सिर्फ एक कप कॉफी पीना चाहता हूं आपके साथ और कुछ नहीं। मेरे चेहरे पर हैरानी और असमंजस दोनों तरह के भाव थे। सच में मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं उसे क्या कहूं। किसी के साथ कॉफी पीना वह भी एक लड़के के साथ मेरे लिए तो इंपॉसिबल ही था। सच कहूं तो मेरा मन भी नहीं था उसके साथ कॉफी पीने का। ऐसे कैसे मैं किसी के साथ कॉफी पी लूं। पर जब वह बस से उतरा तो जिस तरफ मैं खिड़की की साइड बैठी हुई थी वहां खड़ा हो गया। बस वहीं पर...... उसकी वह आंखें जो मुझे देख रही थी पता नहीं क्या था उनमें ?कुछ लाचारी कुछ बेबसी और जो बहुत कुछ कहना चाहती थी। सच कहूं तो आज भी उन आंखों को याद करके एक पल के लिए दिल धड़क जाता है। मोहब्बत नहीं थी ये, मैं जानती हूं। मुझे उसका चेहरा बिल्कुल याद नहीं है। पर एक धुंधली सी याद उसकी आंखों की चेहरे पर एक स्माइल ले ही आती है। सच में इस वक्त भी मैं मेरे चेहरे पर बहुत बड़ी सी स्माइल है और उसकी आंखों की याद है।

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: Vasundhara
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