मैं छोड़ आई पीछे जिस मकान में आज भी मेरी मां रहती है, जिस घर में वो हमें कहानी सुनाया करती थी, वो मकान आज भी वो कहानी सुनाया करती है। सपनों के माया मृग के पीछे पीछे, जाने कितने आगे निकल आए हम, वो पुराना मकान आज भी वहीं, हमारा इंतजार करती है। वो समेट रखी है, बचपन की यादों को, जवानी के ख़्वाबों को, आगे बढ़ने की जज्बा को, और पहली उड़ान की हौसला को, वो पुराना मकान आज सहेज रही है, मां की उम्मीदों को, उसकी करुण पुकार को, छलकती आंखों से नित्य अश्क बहाती है। मैं छोड़ आई जिस मकान में आज भी मेरी मां रहती है। आज भी गूंजते हैं पिता जी के आवाज़, आज भी बचपन पुकारता है, पर पता नहीं जकड़े हैं यह कौन से जंजीर, न लौट पाते हैं, न ठहर पाते हैं। पर वो पुराना मकान आज याद बहुत आता है, जिस मकान में आज भी मेरी मां रहती है। गीतांजलि 'गीत '
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