आजादी सच यह आवरण-- 15 अगस्त आते ही तिरंगे फहराना, देशभक्ति के स्टेटस लगाना और 'जन गण मन' गा लेना आसान है, लेकिन वास्तविक स्वतंत्रता क्या है? क्या केवल ब्रिटिश हुकूमत के चले जाने से हम आज़ाद हो गए, या हमारी मानसिकता आज भी वैचारिक ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई है? आपकी बात पर गहराई से विचार करें तो आज़ादी के 80 साल बाद भी हमारी स्थिति के ये मुख्य पहलू सामने आते हैं: भाषा की मानसिक ग़ुलामी: आज अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा या संवाद का साधन नहीं, बल्कि 'अभिजात वर्ग' (Elite class) होने का प्रतीक बन गई है। अपनी ही मातृभाषा या संस्कृत बोलने में संकोच होना और अंग्रेजी न बोलने वाले को हीन भावना से देखना—यह सिद्ध करता है कि मैकाले की शिक्षा नीति आज भी हम पर हावी है। संस्कृति और सनातन से दूरी: हम आधुनिकता और 'ग्लोबल' बनने की दौड़ में अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं। बच्चों को कंप्यूटर और करियर के नंबर वन की रेस में दौड़ाया जा रहा है, पर अपने इतिहास, जीवन मूल्यों और सनातन ज्ञान से दूर कर दिया गया है। आंतरिक फूट और संकीर्णता: 'बांटो और राज करो' की जो नीति अंग्रेज छोड़ गए थे, उसमें हम आज भी उलझे हैं। धर्म, जाति और निजी द्वेष के नाम पर हम आपस में लड़ते हैं, और कई बार जाने-अनजाने अपने ही देश की संपत्ति को नुकसान पहुँचाकर, अपने ही देश को नीचा दिखाकर राजनीतिक इस्तेमाल का शिकार बन जाते हैं। क्या हम कभी आज़ाद हो पाएंगे? हाँ, बिल्कुल हो सकते हैं, लेकिन उसकी शुरुआत हमें स्वयं से करनी होगी: मानसिकता बदलें: अंग्रेजी को केवल एक 'कामकाजी भाषा' समझें, अपनी पहचान या ज्ञान का पैमाना नहीं। अपनी भाषाओं, इतिहास और संस्कृति पर गर्व करना सीखें। जड़ों से जुड़ें: आने वाली पीढ़ी को सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि संस्कार, नैतिक मूल्य और अपने गौरवशाली अतीत का ज्ञान दें। सच्चा नागरिक धर्म: देशभक्ति साल के 365 दिन अपने कर्तव्यों को निभाने में है—देश की संपत्ति की रक्षा करना, आपसी भाईचारा बनाए रखना और देश के विकास में योगदान देना। आज़ादी किसी सरकार या दिवस की मोहताज नहीं होती, आज़ादी हमारी सोच की संकीर्णता और हीन भावना से मुक्त होने का नाम है। जिस दिन हम अपनी पहचान पर गर्व करना और देश हित को सर्वोपरि रखना सीख जाएंगे, उसी दिन हमारे वीरों का बलिदान सही अर्थों में सार्थक होगा।
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