खुद से मुलाकात रोज़ सुबह सबसे पहले मेरी आँखें नहीं, मेरी ज़िम्मेदारियाँ जागती थीं। रसोई की चाय, बच्चों की हँसी, बुज़ुर्गों की दवाइयाँ, घर की धड़कन... सबका ख़याल रखा मैंने। बस एक शख़्स था, जो हर रोज़ छूट जाता था... मैं। उम्र की किताब में कितने ही पन्ने पलट गए, कभी बेटी बनकर, कभी पत्नी, कभी माँ, तो कभी बहू बनकर... हर रिश्ता निभाया, हर फ़र्ज़ मुस्कुराकर पूरा किया, लेकिन उन मुस्कानों के पीछे कितनी बार मेरा मन चुपचाप रोया, किसी ने नहीं देखा। ज़िंदगी ने जब-जब मेरी परीक्षा ली, मैं हर बार टूटी भी... और हर बार अपने ही आँसू पोंछकर फिर से खड़ी हो गई। एक दिन, भागती हुई ज़िंदगी से कुछ पल चुरा लिए मैंने। आईने के सामने बैठी, तो लगा... सामने कोई अजनबी नहीं, बरसों से मेरा इंतज़ार करती मैं ही खड़ी थी। उसने मुस्कुराकर पूछा, "थक गई हो ना?" बस इतना सुनना था, और बरसों से रोके हुए आँसू आँखों से बह निकले। उस दिन पहली बार मैंने अपने दर्द को कमज़ोरी नहीं, अपनी ताक़त माना। अपने बिखरे सपनों को समेटा, अपनी अधूरी ख्वाहिशों को फिर से गले लगाया। अब मैं पहले जैसी नहीं हूँ... अब मैं हर किसी के लिए जीती हूँ, लेकिन अपने लिए भी थोड़ा-सा जीती हूँ। क्योंकि समझ गई हूँ— एक औरत की सबसे बड़ी जीत दुनिया से नहीं, खुद से हारना छोड़ देने में होती है। और... जिस दिन वह अपने ही हाथों को थाम लेती है, उस दिन उसकी ज़िंदगी बदल जाती है। वह किसी की परछाई नहीं रहती, वह खुद अपनी पहचान बन जाती है। खुद से मुलाकात... यही वह सफ़र है, जहाँ एक औरत टूटती नहीं, संवरती है... बिखरती नहीं, निखरती है... और पहली बार खुद को पूरे दिल से अपना लेती है। — नेहा गोयल ✍️
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