रात 12 बजे की काॅल

रात 12 बजे की कॉल रात के ठीक बारह बजे थे। पूरा शहर गहरी नींद में डूब चुका था। सड़कों पर पसरा सन्नाटा ऐसा लग रहा था मानो समय भी कुछ पल के लिए ठहर गया हो। हल्की-हल्की बारिश खिड़की के शीशों पर दस्तक दे रही थी। अपने छोटे से कमरे में बैठी अनन्या लैपटॉप बंद करके सोने ही वाली थी कि अचानक उसका फोन बज उठा। स्क्रीन पर कोई नाम नहीं था, सिर्फ़ एक अनजान नंबर चमक रहा था। उसने कुछ पल सोचा कि इतनी रात को कौन हो सकता है। पहले तो उसने कॉल काट दी, लेकिन कुछ सेकंड बाद फिर वही नंबर कॉल करने लगा। इस बार उसने गहरी साँस लेकर कॉल रिसीव कर ली। "हेलो..." उसने धीमी आवाज़ में कहा। कुछ सेकंड तक दूसरी तरफ़ पूरी खामोशी रही। फिर एक लड़के की आवाज़ सुनाई दी, "क्या मैं अनन्या से बात कर रहा हूँ?" "जी... लेकिन आप कौन?" "शायद तुम मुझे नहीं जानती... मेरा नाम आरव है।" अनन्या हैरान रह गई। उसने याद करने की कोशिश की, लेकिन उसे इस नाम का कोई इंसान याद नहीं आया। उसने थोड़ी सख्ती से कहा, "देखिए, रात के बारह बजे किसी अनजान लड़की को कॉल करना सही बात नहीं है।" दूसरी तरफ़ से हल्की-सी हँसी आई। "मुझे पता है... लेकिन अगर आज मैंने तुम्हें कॉल नहीं किया, तो शायद कभी हिम्मत नहीं जुटा पाऊँगा।" अनन्या कुछ समझ नहीं पा रही थी। उसने फोन काटने का सोचा, लेकिन उस आवाज़ में एक अजीब-सी सच्चाई थी जिसने उसे रोक लिया। आरव ने बताया कि उसने अनन्या को पहली बार लगभग छह महीने पहले एक पुस्तक मेले में देखा था। वह अपने दोस्तों के साथ आई थी और किताबों के बीच खोई हुई मुस्कुरा रही थी। उसी दिन से वह उसे भूल नहीं पाया। उसने कभी उसका पीछा नहीं किया, कभी परेशान नहीं किया। बस संयोग से सोशल मीडिया पर उसका प्रोफ़ाइल मिला और फिर बहुत हिम्मत करके उसका नंबर भी। कई बार उसने कॉल करने की कोशिश की, लेकिन हर बार डरकर फोन रख देता था। आज उसने तय किया कि जो दिल में है, कम से कम एक बार कह देगा। अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा, "तो इतनी बड़ी कहानी सिर्फ़ इसलिए कि आप 'हाय' नहीं बोल पाए?" आरव भी हँस पड़ा। "हाँ... कुछ लोग पहली नज़र में ही दिल में जगह बना लेते हैं।" बातों का सिलसिला शुरू हुआ और कब आधा घंटा बीत गया, दोनों को पता ही नहीं चला। दोनों को किताबें पसंद थीं, बारिश पसंद थी। चाय पसंद थी और रात की शांति भी। ऐसा लग रहा था जैसे दो अजनबी नहीं, बल्कि पुराने दोस्त बात कर रहे हों। अगले दिन रात ठीक बारह बजे फिर फोन बजा। "हेलो..." "मैं आरव..." "मुझे पता था," अनन्या ने मुस्कुराकर कहा। उस रात दोनों ने अपने बचपन की बातें कीं। आरव ने बताया कि उसने बहुत छोटी उम्र में अपनी माँ को खो दिया था। उसके पिता हमेशा काम में व्यस्त रहते थे। अकेलेपन ने उसे कम बोलने वाला बना दिया था। अनन्या ने भी अपने संघर्ष बताए—कैसे उसने हर मुश्किल का सामना मुस्कुराकर किया, कैसे उसने कभी अपने सपनों को टूटने नहीं दिया। धीरे-धीरे यह रोज़ की आदत बन गई। दिन चाहे कितना भी व्यस्त हो, रात के बारह बजे दोनों की कॉल ज़रूर होती। कभी पाँच मिनट, कभी पाँच घंटे। दोनों एक-दूसरे की ज़िंदगी का सबसे सुकून भरा हिस्सा बन गए। एक रात आरव ने पूछा, "अगर हम कभी मिले, तो सबसे पहले क्या करोगी?" अनन्या ने हँसते हुए कहा, "पहले यह देखूँगी कि तुम सच में इतने ही अच्छे हो या सिर्फ़ फोन पर।" "और अगर अच्छे निकला?" "तो शायद दोस्ती पक्की कर लूँ।" "सिर्फ़ दोस्ती?" फोन के दूसरी तरफ़ कुछ पल की खामोशी छा गई। फिर दोनों एक साथ हँस पड़े। महीनों बाद आखिर वह दिन आया जब दोनों मिलने वाले थे। शहर के एक शांत कैफ़े में शाम पाँच बजे मिलने का समय तय हुआ। अनन्या थोड़ी घबराई हुई थी। जैसे ही वह पहुँची, उसने देखा कि खिड़की के पास बैठा एक लड़का किताब पढ़ रहा था। वही मुस्कान, वही आवाज़, वही सादगी। आरव ने उसे देखा और खड़ा हो गया। "हाय..." "इतनी देर से पहली बार आमने-सामने 'हाय' बोल पाए," अनन्या ने मज़ाक किया। दोनों ज़ोर से हँस पड़े। उस दिन घंटों बातें हुईं। ऐसा लगा जैसे दोनों एक-दूसरे को वर्षों से जानते हों। मुलाक़ात के बाद उनका रिश्ता और भी गहरा हो गया। कुछ समय बाद आरव को नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहर जाना पड़ा। दूरी बढ़ गई, लेकिन रात बारह बजे की कॉल कभी नहीं रुकी। चाहे वह कितनी भी थकान में हो, चाहे अनन्या कितनी भी व्यस्त हो, दोनों एक-दूसरे के लिए समय निकाल ही लेते। फिर एक दिन सब बदल गया। रात के बारह बजे अनन्या फोन का इंतज़ार करती रही, लेकिन कॉल नहीं आई। उसने सोचा शायद आरव काम में व्यस्त होगा। उसने खुद कॉल किया, लेकिन फोन बंद था। अगले दिन भी वही हुआ। तीसरे दिन भी। अब उसकी बेचैनी बढ़ने लगी। उसने संदेश भेजे, ईमेल किए, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। लगभग एक हफ्ते बाद उसके फोन पर एक कॉल आई। "क्या आप अनन्या बोल रही हैं?" "जी..." "मैं आरव का दोस्त विवेक बोल रहा हूँ।" अनन्या का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। विवेक ने बताया कि आरव अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था। अस्पताल में भर्ती था और फोन इस्तेमाल नहीं कर पा रहा था। लेकिन होश में आते ही उसने सबसे पहले अनन्या के बारे में पूछा। यह सुनकर अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले। अगले ही दिन वह उससे मिलने अस्पताल पहुँची। आरव ने उसे देखते ही हल्की-सी मुस्कान दी। "आज... बारह बजे की कॉल नहीं कर पाया..." अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया। "कोई बात नहीं... आज मैं खुद मिलने आ गई।" कुछ दिनों में आरव पूरी तरह ठीक हो गया। उस घटना ने दोनों को एहसास दिला दिया कि ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं। उन्होंने तय किया कि अब सिर्फ़ फोन पर नहीं, बल्कि हर खुशी और हर मुश्किल में साथ चलेंगे। एक रात फिर घड़ी ने बारह बजाए। फोन बजा। अनन्या ने कॉल उठाई। "हेलो..." "सो रही थीं?" "नहीं... तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।" "जानती हो... हमारी पहली कॉल भी रात के बारह बजे ही हुई थी।" "और शायद आख़िरी भी इसी समय होगी..." "आख़िरी क्यों?" "क्योंकि शादी के बाद तो एक ही घर में रहेंगे... फिर कॉल की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।" कुछ पल के लिए दोनों चुप हो गए। फिर दोनों की हँसी पूरे कमरे में गूँज उठी। कुछ महीनों बाद उनकी शादी हो गई। शादी की पहली रात, जब घड़ी ने बारह बजाए, आरव ने मुस्कुराकर अपना फोन निकाला और अनन्या का नंबर डायल कर दिया। अनन्या का फोन उसके बगल में रखा था। फोन बजा तो वह हँसते हुए बोली, "जब मैं यहीं हूँ तो कॉल क्यों?" आरव ने प्यार से कहा, "क्योंकि इस कॉल ने हमें मिलाया था। मैं चाहता हूँ कि हमारी ज़िंदगी में रात बारह बजे की घंटी हमेशा हमें याद दिलाती रहे कि कभी दो अजनबी सिर्फ़ एक कॉल की वजह से हमेशा के लिए अपना बन गए थे।" उस रात दोनों बालकनी में बैठकर बारिश देखते रहे। अब न कोई दूरी थी, न कोई डर, न कोई इंतज़ार। सिर्फ़ साथ था, भरोसा था और एक ऐसी याद थी जो हर रात बारह बजे मुस्कुराने की वजह बन जाती थी। कहते हैं कि ज़िंदगी बदलने के लिए हमेशा किसी बड़े चमत्कार की ज़रूरत नहीं होती। कभी-कभी एक अनजान नंबर से आई रात 12 बजे की एक साधारण-सी कॉल भी किसी की पूरी दुनिया बदल देती है। अगले वर्ष, ठीक उसी तारीख़ को जब उनकी पहली रात 12 बजे वाली कॉल हुई थी, आरव ने उसी समय अनन्या को अपने घर की छत पर बुलाया। पूरा आसमान तारों से भरा था। चारों ओर छोटी-छोटी लाइटें जगमगा रही थीं। घड़ी ने जैसे ही रात के 12 बजाए, आरव का फोन बज उठा। अनन्या ने हैरानी से पूछा, "ये किसका कॉल है?" आरव मुस्कुराया, फोन उसकी ओर बढ़ाते हुए बोला, "उठाकर देखो।" स्क्रीन पर लिखा था—"Future Wife ❤️" अनन्या की आँखें नम हो गईं। उसने कॉल रिसीव किया। दूसरी तरफ़ कोई आवाज़ नहीं थी। तभी उसके पीछे खड़े आरव ने घुटनों के बल बैठकर एक छोटी-सी अंगूठी आगे बढ़ाई और कहा, "एक साल पहले रात 12 बजे मैंने एक अजनबी को कॉल किया था। आज उसी लड़की से पूरी ज़िंदगी साथ चलने की इजाज़त माँग रहा हूँ। क्या तुम मेरी हर रात की आख़िरी बात और हर सुबह की पहली मुस्कान बनोगी?" अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले। उसने बिना कुछ कहे मुस्कुराते हुए अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। आरव ने उसकी उँगली में अंगूठी पहनाई और दोनों एक-दूसरे के गले लग गए। कुछ महीनों बाद उनकी शादी हो गई। शादी की पहली रात, जब घड़ी ने फिर रात के 12 बजाए, आरव ने मुस्कुराकर अपना फोन उठाया और अनन्या के नंबर पर कॉल लगा दी। फोन उनके ही कमरे में बज उठा। अनन्या हँसते हुए बोली, "अब भी कॉल?" आरव ने उसका हाथ थामकर कहा, "हाँ... क्योंकि अगर उस रात 12 बजे मैंने वो पहला कॉल न किया होता, तो शायद मेरी पूरी ज़िंदगी अधूरी रह जाती।" अनन्या ने सिर उसके कंधे पर रख दिया और धीमे से कहा, "कुछ कॉल सिर्फ़ बातें नहीं जोड़तीं... वे दो तक़दीरों को हमेशा के लिए एक कर देती हैं।" उस रात खिड़की के बाहर फिर हल्की बारिश हो रही थी। घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ती रहीं, लेकिन उनके लिए समय जैसे वहीं ठहर गया था—रात के ठीक 12 बजे, जहाँ एक अनजान कॉल ने दो अजनबियों को एक ऐसी प्रेम कहानी में बदल दिया, जिसे वक़्त भी कभी मिटा नहीं सका। समाप्त। लेखक = श्वेता अग्रवाल 🥀🥀✍️✍️😌😌


: ♥️𝄟≛⃝Sweta Agrawal🌹❤️ 🕊
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