कालीपुर का रक्षक

रात की परछाइयाँ “बचाओ…! बचाओ दादा….! बचाओ…!” “हुवाँ…. हुवाँ….. हुवाँ…!” गीदड़ों की डरावनी आवाजें उठ रही थी। “आज फिर गाँव की एक औरत शिकार हो गयी।” शम्भू चिल्लाता हुआ गाँव के पूरब की ओर भागा। चिड़ियों का एक झुण्ड आम के बाग से निकलकर चीं..चीं.. ची.. ची.. करते हुए पश्चिम की ओर उड़ता चला गया। अरे ओ शम्भू…….! भोला……! मोहन……! उजागर……! कैलाश…..! तुम लोग कहाँ हो….? क्या कर रहे हो…..? सबके सब कहाँ मर गये? सब अपनी-अपनी लाठी और टार्च लेकर घर से बाहार निकलो! जल्दी करो ! थोड़ा हिम्मत करो! देवदत्त ने ललकारते हुए चिल्लाकर कहा। शम्भू गरजते हुए बोला— “दौड़ो! अभी बाग से आगे नहीं गई होगी।” दो मिनट में भोला, मोहन, शम्भू के साथ सात-आठ जवान लड़के लाठी और टार्च लेकर आम के बाग की ओर दौड़ते हुए गये। उनकी टॉर्च की रोशनी पूरे बाग में चमकने लगी। भोला नदी की ओर इशारा करते हुए हड़बड़ी में बोला – “उधर देखो! लगता है कि नदी की ओर वह गई है।” “चलो देखते हैं।” मोहन ने कहा। शम्भू ने कहा, “सब लोग चारों तरफ देखते हुए आगे बढ़ो! कहीं ऐसा न हो कि कोई हम पर पीछे से हमला कर दे।” सब नदी के किनारे तक गये लेकिन किसी को कुछ पता नहीं चल सका। निराश होकर सब वापस लौट पड़े। कालीपुर गाँव के पूरब छोर के किनारे एक फूस के झोपड़ी में रहने वाली गौरी अपने घर के आँगन में कपड़े समेट रही थी। उसका पति रामलाल अभी तक खेत से वापस नहीं लौटा था। शाम का धुंधलापन में जब उसे अचानक दूर से किसी औरत के चीखने की आवाज सुनाई पड़ी। गौरी चौंककर खड़ी हो गई। और झट से सीढ़ी से चढ़कर कोठरी की छत पर पहुंच कर चिल्लाने लगी— “ओ रामू के बाबा! कहाँ रह गये?” उसकी आवाज सुनकर बगल के घर से रामदीन की औरत भी अपनी छत पर आ गयी। वह बोली— “चाची! जरूर यह ब्रह्मराक्षस की कारस्तानी होगी! इसने तो गाँव को बहुत परेशान कर रखा है।” गौरी ने व्याकुलता में कहा— “यह राक्षस तो आए दिन शिकार करने लगा है। इसके डर से तो सूरज ढलते घर से बाहर शौक जाने तक के लिए निकलना मुश्किल हो गया है।” वह कुछ और कहती कि अचानक खेतों की तरफ से फिर डरावनी हुआँ-हुआँ की आवाज़ गूँज उठी। गौरी डरते-डरते कहा — “ औरत के चीखने- चिल्लाने की आवाज आम के बाग़ की तरफ से आई थी।” ऐसा लगा कि जैसे कोई जंगली जानवर नहीं… बल्कि कुछ और हो। गौरी का दिल जोर से धड़कने लगा। वह जोर से चिल्लाई— “ओ देखो! उधर बाग की ओर से कोई भाग रहा है!” गाँव में सब अपने-अपने घरों की छतों पर चढ़कर आपस में चर्चा करने लगे। कोई टाॅर्च तो कोई लालटेन लिए अपने बच्चों समेत छत पर से गाँव के चारों तरफ देखने लगे। उधर नदी की ओर से सब जवान लौट ही रहे थे कि उनको एक परछाई बाग से निकलकर पश्चिम की ओर भागती दिखाई पड़ी। “अरे ओ देखो ! कोई भाग रहा है…।” मोहन चिल्लाया। “ए रुक ! कौन है तू?” भोला ने ललकारते हुए कहा। परछाई और तेजी से गाँव के पोखर को पार करते हुए पगडंडी के किनारे खड़े पतवार की ओट पाकर गायब हो गई। शम्भू टार्च उधर मारते हुए बोला, “बच के न जाने दूंगा आज तुझे।” पच्छिम टोला के भगत की लड़की कुएँ पर पानी भरने गई थी वह डर के मारे बाल्टी की रस्सी कुएं में ही छोड़कर घर की ओर भागते-भागते चिल्लाई— “अरे ! बाप रे कोई इधर ही आ रहा है।” ऐसा कहते हुए वह घर की चौखट से टकराकर गिर पड़ी। उसकी माँ ने दौड़कर दरवाजा बंद कर लिया और अपनी लड़की को संभालने लगी। “अरे देखो! तो इसकी सांस धौंकनी के जैसे कितनी तेज चल रही है।” हवा एकदम शांत थी फिर भी न जाने कौन पच्छिम की पगडंडी के किनारे पतवार के झुण्ड को जोर-जोर से हिला रहा था। यह देखकर जवानों के पैर वहीं के वहीं रुक गये। रंजीत ने पगडंडी की ओर इशारा करते हुए कहा— “देखो ऐसा लगता है कि कोई शक्ति पतवार को हिला रही है। उसके पीछे जरूर कोई न कोई होगा।” तभी गौरी को फिर अंधेरे में आम के पेड़ों के बीच एक काली परछाईं हिलती हुई दिखाई दी। वह चिल्लाई— “ओ देखो! बाग में कोई है।” सब आम के बाग की ओर देखने लगे। लेकिन किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। और फिर… सब कुछ शांत हो गया। तभी रामधनी के घर से रोने चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। सबका ध्यान बाग और खेत से हटकर रामधनी के घर की ओर गया। जब लोग रामधनी के घर पहुँचे तो देखा कि रामधनी अपने घर की देहरी पर बैठा रो रहा था और उसकी औरत और दोनों छोटे लड़के आंगन में चिल्ला-चिल्लाकर रो रहे थे। पता चला कि उसकी 14 साल की लड़की शौच के लिए गयी थी तब से वह नहीं लौटी है। कालीपुर गाँव में सूरज डूबते ही सन्नाटा छा जाता था। जैसे ही आकाश लाल से काला होता, लोग जल्दी-जल्दी अपने खिड़की- दरवाज़े बंद कर लेते थे। घरों की खिड़कियों और दरवाजों के पीछे मोटे लकड़ी के डंडे डाल दिए जाते थे ताकि आसानी से कोई दरवाजा धक्का मारकर खोल न सके। इसके साथ ही गलियों में सन्नाटा छा जाता था। डर के मारे लोग गर्मियों में भी घर से बाहर रात में नहीं सोते थे। गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे— “सूरज ढलने के बाद बाहर मत निकलना… रात को भूत और डायनें खेतों में घूमती हैं।” बच्चे ये सब बातें सुनकर माँ की गोद में छिप जाते। उस रात भी हवा में अजीब-सा डर था। अगली सुबह गाँव में हड़कंप मचा हुआ था। धनीराम की बेटी रूमा गायब थी। उसके घर के बाहर जमीन पर अजीब निशान बने थे—राख, टूटी हुई चूड़ियाँ और कुछ हड्डियाँ। औरतें रो रही थीं। पुरुष घबराए हुए एक-दूसरे से पूछ रहे थे। “कल रात फिर वही हुआ…!” “ यह तीसरी घटना है जब हमारे गाँव से फिर धनीराम की बेटी गायब हो गई…!” एक बूढ़ी औरत काँपती आवाज़ में बोली— “मैंने कहा था… ये रात की डायनें हैं… जो औरतों की आत्मा को खा जाती हैं…” डर पूरे गाँव में फैल गया था। पौ फटते ही लोग रामधनी के घर के बाहर इकट्ठा होने लगे। औरतें घर में रामधनी की औरत और बच्चों को समझाने में लग गयीं। बिसकर्मा ने कहा — “चलो ! बाबा सागर दास के पास चलते हैं।” “हाँ! अब तो वही कुछ कर सकते हैं।” देबदत्त ने कहा। धनीराम को लेकर दस -पंद्रह लोग कालीपुर की पहाड़ी पर जंगल में बने काली माता के मन्दिर में सागर दास के पास पहुंचे। सब वहीं बैठ गये और सागर दास के बाहर निकलने का इंतजार करने लगे। तांत्रिक सागर दास वहीं रहता था। करीब दो घंटे बाद दरवाज़ा खुला। उसके कमरे के अंदर से मांस और लोबान के जलने से धुएँ की तीखी गंध आ रही थी। तांत्रिक सागर दास बाहर निकला। उसके माथे पर राख लगी थी और वह गले में हड्डियों की माला पहना हुआ था। उसने गहरी आवाज़ में कहा— “मैंने पहले ही चेतावनी दी थी… गाँव पर डायनों का साया है।” लोग डर से कांप उठे। धनीराम रोते हुए उसके पैरों में गिर पड़ा— “बाबा… मेरी बिटिया को बचा लो…” सागर दास ने आँखें बंद कीं, जैसे किसी अदृश्य शक्ति से बात कर रहा हो। फिर वह धीरे से बोला— “आज रात मैं एक बड़ा अनुष्ठान करूँगा…वरना अगली बार किसी और की बारी होगी।” गाँव के लोगों में सन्नाटा छा गया। क्योंकि सबको पता था कि रात फिर होगी और अब कोई और शिकार न बने इसलिए सागर दास के अलावा उनके पास और किसी का सहारा नहीं था जो उनकी इस मामले में मदद कर सके। धनीराम ने तांत्रिक सागर दास के पैर पकड़ लिये और गिड़गिड़ाने लगा— “बाबा! मेरे आप ही एक सहारा हो ! आप कुछ करो ! मेरी बेटी वापस करवा दो!” देबदत्त ने आगे बढ़कर सागर दास से कहा — “हाँ! बाबा, कुछ ऐसा करो कि जिससे अब आगे कहीं अंधेरे में… और कोई औरत अगला शिकार न बने!” “बाबा! आजकल कालीपुर गाँव कई महीनों से डर के साये में जी रहा है।” रात होते ही गाँव की गलियाँ सूनी हो जातीं, दरवाज़े बंद हो जाते और हर घर में बेचैनी फैल जाती।” शम्भू ने यह बात तांत्रिक सागर दास से एक सांस में कह दी। शम्भू ने कहा— “गाँव की औरतों का रहस्यमय ढंग से रात में गायब हो जाना एक रहस्य बन गया है।” “हाँ! कभी किसी की बहू, कभी किसी की बेटी… और कभी किसी की पत्नी।” कैलाश ने शम्भू की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा। रंजीत ने भी अपनी बात पर जोर देते हुए कहा— “सुबह होने पर वे या तो खेतों के पास बेहोश मिलतीं या कई दिनों तक उनका कोई पता नहीं चलता।” गाँव के लोग घबराकर तांत्रिक सागर दास के पास पहुँचे, जो पास के जंगल में काली माता के पुराने मन्दिर में कुछ दिनों से आकर रहने लगा था। उसके बारे में कहा जाता था कि वह तंत्र-मंत्र और अदृश्य शक्तियों का बड़ा ज्ञाता था। सागर दास ने भी देखा कि गाँव के लोगों में अशिक्षा, अंधविश्वास और पिछड़ापन बहुत अधिक फैला हुआ है। उसने गाँव वालों की इस कमजोरी का खूब फायदा उठाया। वह लोगों की बीमारियों को झाड़ फूंक और मंन्दिर के यज्ञशाला की भस्म आदि से ठीक कर दिया करता था। कभी कोई अपनी समस्या लेकर जाता तो वह कोई उपाय बता देता और कुछ भस्म आदि देकर वापस भेज देता। जब कुछ लोगों को इन उपायों से कुछ राहत मिल जाती तो वह सागर दास की कृपा और आशीर्वाद का फल मान लेता। इससे वह दस और लोगों के बीच में सागर दास की महिमा का बखान किया करता। इन सब बातों से उस गाँव और आसपास के इलाकों में सागर दास का नाम चलने लगा। शम्भू और धनीराम की बात सुनकर सागर दास ने उनसे कहा— “आप लोग अपने -अपने घर जाओ! मैं दो घंटे बाद गाँव आकर समस्या को समझूंगा और फिर कोई उपाय करूँगा।” दोपहर के बाद चार बजे गाँव के चौपाल में सबके सामने सागर दास ने आँखें बंद करके कुछ मंत्र बुदबुदाए, फिर गहरी आवाज़ में बोला— “कालीपुर की धरती पर एक क्रोधित चुड़ैल और प्रेतात्माएँ भटक रही है।” “चुड़ैल ….” गाँव वालों में खुसर-फुसर शुरू हो गयी। “तुम लोगों में से जो पुराने लोग हैं वे जानते होंगें लेकिन कोई बता नहीं रहा है कि किस औरत के साथ अन्याय हुआ था।” सागर दास ने लोगों के सामने अपनी लाल-लाल,बड़ी आँखें निकालते हुए कहा। चौपाल में सन्नाटा पसर गया। कोई कुछ नहीं बोल पा रहा था। थोड़ी देर किसी के भी न बोलने पर सागर दास ने फिर कहा— “बहुत साल पहले इस गाँव की एक स्त्री के साथ अन्याय हुआ था। उसी की आत्मा अब बदला लेने के लिए गाँव की औरतों को रात में अपने वश में कर लेती है और उन्हें जंगल की ओर खींच ले जाती है।” यह सुनकर गाँव में सन्नाटा छा गया। घरों के दरवाजों के पीछे बैठी औरतें यह सब सुनकर आपस में बातें करने लगीं। सागर दास ने आगे कहा— “अगर इस प्रेतात्मा को शांत नहीं किया गया तो यह घटना बढ़ती जाएगी।” गाँव वालों ने डरते-डरते पूछा, “बाबा, इसका उपाय क्या है?” तांत्रिक सागर दास ने गंभीर स्वर में कहा— “इसका एक ही समाधान है। अमावस्या की रात काली माता का विशेष तांत्रिक अनुष्ठान करना होगा। गाँव के हर घर से सरसों का तेल, काला तिल और लाल कपड़ा लाना होगा। साथ ही एक काला बकरा बलि के लिए देना होगा। तब मैं मंत्रों से उस आत्मा को बाँधकर इस गाँव से दूर भेज दूँगा।” मोहन ने हिम्मत करके पूछा— “बाबा! क्या इससे हमारे गाँव को चुड़ैल से छुटकारा मिल जाएगा?” “मैं कोई गारंटी नहीं लेता लेकिन मैं पूरी कोशिश करूँगा।” सागर दास ने साफ शब्दों में कहा। गाँव के लोग भयभीत थे। उन्हें लगा कि यही एक रास्ता है जिससे उनकी बहू-बेटियों को बचाया जा सकता है। सब आपस में सलाह-मशविरा करने लगे। सागर दास को लगा कि कहीं उसका यह दाँव खाली न चला जाये तो उसने एक और चाल चली। उसने लोगों को समझाया — “कोई चुड़ैल अकेले नहीं रहती है। चुड़ैलों का गिरोह चलता है। और उनके साथ भूत- प्रेत, ब्रह्म राक्षस आदि सब रहते हैं।” यह सुनकर गाँव वाले और डर गये। सबने मिलकर यह तय किया कि सागर दास की बात मानकर पूजा की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। सागर दास अचानक उठकर खड़े हो गये और बोले— “तो फिर आप लोग अमावस्या की पूजा की तैयारी शुरू करो! मैं आगे की देखता हूँ।” अमावस्या की रात के लिए पूजा की तैयारी शुरू हो गई। लेकिन कुछ लोगों के मन में सवाल भी उठने लगे—क्या सच में कोई प्रेतात्मा है, या इस रहस्य के पीछे कोई और सच्चाई छिपी है…? उनके इस संशय को बढाने वाला एक शहरी युवक सागर दास के जाने के बाद उस गाँव मे पहुँच गया था। उसने गाँव के लोगों से पूरी बात जानने के बाद पूछा — “क्या आप लोगों ने लड़की के गायब होने की रिपोर्ट पुलिस थाने में लिखाई?” बिसकर्मा ने कहा — “पुलिस क्या कर लेगी? पुलिस उल्टे ही गाँव के लोगों को परेशान करने लगेगी।” “तुम सब लोग अनपढ़ और गँवार हो! तुमको कोई भी मूर्ख बनाकर चला जाता है। इसीलिए तुम सब परेशान होते हो।” उस युवक ने गुस्से में आकर जोर से कहा। गाँव के लोग उस अनजाने युवक की बात सुनकर उसके ऊपर गुस्सा करने लगे। देबदत्त बोला— “अरे भैया! तुम कौन हो? कहाँ से आए हो?” “मैं आप लोगों का भला चाहता हूँ और मैं आपकी मदद करना चाहता हूँ। बस इतना समझ लो कि मैं आप लोगों का और इस गाँव का एक शुभचिंतक हूँ।” उस नवयुवक ने चौपाल में बैठे लोगों को समझाया। लेकिन गाँव के लोगों को उस युवक की बातों पर भरोसा नहीं हो रहा था। वे लोग उसकी बातें सुनने को तैयार नहीं थे। बिसकर्मा मूर्तिकार ने कहा- “तुम लोग अमावस्या की पूजा के लिए अपनी तैयारी शुरू करो! हम वही करेंगे जो बाबा सागर दास कहकर गये हैं।” सब लोग उस युवक की बात पर ध्यान न देकर अमावस्या की पूजा की तैयारी शुरू करने में लग जाते हैं। वह युवक गाँव का मुआयना करने के लिए निकलने ही वाला था कि उसकी मुलाकात मोहन से हो गयी। मोहन ने उसे देखते ही पहचान लिया। मोहन ने उस युवक का नाम लेकर गर्मजोशी से उसके गले लिपटकर मिला। सब मोहन और उस युवक के भरत-मिलाप को देखने लगे। उनको ऐसे गले मिलते देखकर बाकी सब अचम्भित रह गये। कालीपुर के इस डरावने रहस्य की असली कहानी अभी सामने आना बाकी थी कि इस युवक ने लोगों के मन में शंका पैदा कर दिया। “मोहन! तुम इनको जानते हो?” “हाँ भोला भाई ! यह अपने गाँव का ही है।” मोहन ने उसका सबसे परिचय करवाते हुए कहा। बिसकर्मा ने कहा— “हमने तो इसको कभी अपने गाँव में नहीं देखा। फिर यह हमारे गाँव का कैसे हो सकता है?” देबदत्त ने शक जाहिर करते हुए कहा— “मुझे तो ऐसा लगता है कि मोहन गाँव से औरतों को गायब करवाने की साजिश में शामिल है।” “मुझे भी दाल में कुछ काला लगता है।” रंजीत ने देबदत्त की हाँ मे हाँ मिलाते हुए कहा। रंजीत की बात खत्म होते ही उजागर बोला- “मुझे तो पूरी दाल ही काली नजर आ रही है।” इन सब की बात सुनकर मोहन झल्लाकर बोला- “चुप हो जाओ! तुम सब लोग बिना जाने समझे किसी के भी बारे में न जाने क्या-क्या अंट-शंट बोले चले जा रहे हो।” “तो फिर तू खुद ही क्यों नहीं बता देता कि असली बात क्या है?” “मैं तब बताऊँगा जब तुम लोग मुझे बोलने दोगे!” मोहन ने नाराजगी से कहा। बिसकर्मा ने सब लोगों को शांत कराते हुए कहा— “ठीक है! हमें मोहन की बात सुननी चाहिए। बताओ मोहन तुम क्या बताना चाहते हो! अब कोई तुमको बीच में नहीं टोकेगा!” मोहन उन गांव वालों को क्या बताता है? वह युवक कौन है? उस युवक का गाँव से क्या संबंध है? और क्या तांत्रिक सागर दास अमावस्या की रात को पूजा करके चुड़ैल के भय से गाँव को मुक्त कर देगा……

355 Views
Time : 5 Hour

Horror

: Mishra
img

All Chapters