नारी कोई परछाईं नहीं, जो धूप ढले मिट जाए, वह तो वह उजास है जो अँधेरों को राह दिखाए। मिट्टी में बीज बनकर वह सृजन की धड़कन है, हर टूटे विश्वास के बाद भी उसके भीतर जीवन की चिंगारी है। कभी ममता की ठंडी छाँव, कभी साहस की जलती मशाल, वह स्वयं में पूर्ण है, किसी पहचान की मोहताज नहीं। उसके मौन में भी क्रांति की आवाज़ बसती है, हर “नहीं” के पीछे उसकी अपनी शर्तें लिखी जाती हैं। नारी का अस्तित्व सिर्फ सहने का नाम नहीं, वह खड़ी है, चल रही है, अपनी शर्तों पर दुनिया रच रही है।
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