विदाई का समय था। आँगन में सन्नाटा पसरा हुआ था। बेटी नंदिनी की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। पिता रामस्वरूप उसके सिर पर हाथ फेरते हुए खुद भी भावुक हो उठे। पंडित जी ने विवाह के समय कहा था, "अब कन्यादान कीजिए।" रामस्वरूप ने मुस्कुराकर बेटी का हाथ दूल्हे के हाथ में रखा, लेकिन उनकी आँखें नम थीं। विवाह संपन्न हो गया। विदाई के समय नंदिनी ने पिता से पूछा, "पापा, क्या सच में आपने मेरा दान कर दिया? क्या अब मैं आपकी नहीं रही?" रामस्वरूप ने बेटी को गले लगा लिया और बोले, "बेटी, दान तो उस चीज़ का होता है जिस पर अधिकार हो। तुम कोई वस्तु नहीं हो। कन्यादान का अर्थ तुम्हें खोना नहीं, बल्कि तुम्हारे सुख और नए जीवन की जिम्मेदारी को प्रेमपूर्वक सौंपना है।" नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले। पिता ने आगे कहा, "तुम आज भी मेरी बेटी हो, कल भी रहोगी और हमेशा रहोगी। रिश्ते दान से नहीं, प्रेम से बनते हैं।" नंदिनी मुस्कुरा दी। विदाई के आँसुओं में अब एक नई चमक थी, क्योंकि उसे समझ आ गया था कि कन्यादान बेटी को खोना नहीं, बल्कि उसके सुख की कामना करना है। बेटियाँ दान की वस्तु नहीं, माता-पिता के हृदय का सबसे अनमोल हिस्सा होती हैं।
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