बाबा ऐसा वर धुंडो...

बाबा, ऐसा वर ढूँढो..." यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि हर उस बेटी के दिल की पुकार है जो अपने पिता के घर का आँगन छोड़ते हुए एक अनजाने सफर पर निकलने को तैयार है। वह अपने पिता से धन-दौलत नहीं, बल्कि एक ऐसा जीवनसाथी मांगती है जो उसकी आत्मा का सम्मान कर सके।

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कविता

: (ध्रुव तारा )Dr Sanjay Rathod
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