खून के निशान

खून के निशान by सुनीता गुप्ता देवगढ़ गाँव की एक पुरानी और रहस्यमयी हवेली वर्षों से वीरान पड़ी थी। गाँव वाले मानते थे कि वहाँ भूत-प्रेतों का साया है, इसलिए कोई उसके पास नहीं जाता था। एक बरसाती रात गाँव का युवक अर्जुन उस हवेली में पहुँचता है और उसे वहाँ खून जैसे कुछ निशान दिखाई देते हैं। उन्हीं निशानों का पीछा करते हुए उसे ठाकुर प्रताप सिंह की एक पुरानी डायरी मिलती है, जिसमें लिखा होता है कि उनकी मृत्यु दुर्घटना नहीं बल्कि एक सुनियोजित हत्या थी। सच की तलाश में अर्जुन हवेली के गुप्त तहखाने तक पहुँचता है, जहाँ उसे ठाकुर की बेटी आराध्या की डायरी और उसका कंकाल मिलता है। धीरे-धीरे अर्जुन को पता चलता है कि वर्षों पहले ठाकुर प्रताप सिंह की अपार संपत्ति हड़पने के लिए उनके ही भाई रणवीर सिंह ने एक भयानक षड्यंत्र रचा था। जब आराध्या को इस साजिश का पता चल गया, तो उसे भी हमेशा के लिए चुप करा दिया गया। जाँच के दौरान अर्जुन को कई गुप्त दस्तावेज, पुरानी वसीयत, रहस्यमयी रिकॉर्डिंग और "साँप के निशान" नामक एक गुप्त संगठन के संकेत मिलते हैं। गाँव के लोग सब कुछ जानते हुए भी भय के कारण चुप रहते हैं। अर्जुन पर कई बार जानलेवा हमले होते हैं, लेकिन वह पीछे नहीं हटता। जैसे-जैसे रहस्य की परतें खुलती हैं, अर्जुन को पता चलता है कि यह केवल दो हत्याओं का मामला नहीं, बल्कि लालच, विश्वासघात और सत्ता की भूख से जुड़ा एक बड़ा षड्यंत्र है। कई ऐसे लोग सामने आते हैं जो वर्षों से सच छिपाने में शामिल थे। अंततः आराध्या की अधूरी डायरी का अंतिम भाग और एक जीवित गवाह पूरी सच्चाई उजागर कर देते हैं। अंतिम टकराव में रणवीर सिंह और उसके सहयोगियों के अपराध दुनिया के सामने आ जाते हैं। कानून उन्हें सजा देता है और ठाकुर प्रताप सिंह तथा आराध्या को न्याय मिलता है। वर्षों से हवेली की दीवारों पर चिपके खून के निशान भले मिट जाते हैं, लेकिन उनकी कहानी गाँव के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती है। उपन्यास का अंत एक नई सुबह के साथ होता है, जब अर्जुन उस अभिशप्त हवेली को एक पुस्तकालय और विद्यालय में बदल देता है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ डर नहीं, बल्कि ज्ञान और सत्य के साथ जी सकें। "झूठ चाहे कितने वर्षों तक सच को दबाकर रखे, लेकिन एक दिन सत्य अपने निशान छोड़ ही जाता है।" सुनीता गुप्ता

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Time : 7 Hour

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: Sunita
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