लफ़्ज़ों से धात खाकसारी का रिवाज महोब्बत में शामिल नहीं है इन्तेंहा महोब्बत की है तो हम काबिल नही हैं जुलसती दांस्तानो को अधुरे लफ्जो में कहना नही है महोब्बत की रिवायत को अब ओर सहना नही है लुत्फेगम से बैजार हुऐ है जार जार अब रोना नही है वबा ये लाईलाज है मरीज-ए-ईश्क हमें होना नही है खाकसारी =आजिजी वबा=बिमारी ,
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