मेरी डायरी

उस दिन सुबह से ही मन अजीब सा चिड़चिड़ा था। कोई खास वजह नहीं थी, लेकिन भीतर जैसे बहुत सारी बातें जमा हो चुकी थीं। नौकरी का तनाव, लगातार काम, लोगों की उम्मीदें… सब कुछ मिलकर मुझे अंदर ही अंदर थका चुका था। और सबसे ज्यादा गुस्सा मुझे उन्हीं लोगों पर आने लगा था जो मुझसे सबसे ज्यादा प्यार करते थे। माँ सुबह से रसोई में लगी हुई थीं। पिताजी बाहर आँगन में बैठे चाय पी रहे थे। छोटी बहन कॉलेज जाने की तैयारी कर रही थी। घर बिल्कुल रोज जैसा ही था, लेकिन मेरे अंदर जैसे हर छोटी बात चुभ रही थी। मैं कमरे में बैठी मोबाइल चला रही थी। ऑफिस जाने का मन नहीं था। तभी माँ ने बाहर से आवाज लगाई— “प्रियंका, नाश्ता तैयार है बेटा।” मैंने बिना ध्यान दिए कहा, “रख दो… आती हूँ।” कुछ देर बाद फिर आवाज आई— “दवाई भी खा लेना समय से।” बस वही बात मुझे बुरी लग गई। मुझे हमेशा लगता था कि माँ हर बात में जरूरत से ज्यादा चिंता करती हैं। उस दिन जाने क्यों मेरा धैर्य बिल्कुल खत्म हो चुका था। मैं तेज कदमों से बाहर आई और ऊँची आवाज में बोली— “माँ, हर समय मेरी चिंता करना जरूरी है क्या? मैं बच्ची नहीं हूँ।” माँ कुछ पल मुझे देखती रहीं। उनके हाथ में गरम पराठा था। फिर उन्होंने धीरे से कहा— “चिंता नहीं करेंगे तो कौन करेगा?” लेकिन उस समय मेरे भीतर गुस्सा ज्यादा था, समझ कम। मैंने प्लेट दूर सरकाई और कहा— “आप लोगों ने मेरी जिंदगी को बोझ बना दिया है। हर समय टोकना, हर समय सलाह देना… दम घुटता है मेरा इस घर में।” पिताजी ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में नाराजगी कम, दुख ज्यादा था। उन्होंने शांत आवाज में कहा, “बात करने का तरीका ठीक रखो।” लेकिन उस दिन मैं जैसे खुद पर काबू खो चुकी थी। मैंने ऐसी बातें कह दीं जिन्हें याद करके आज भी शर्म आती है। मैंने कहा— “आप लोगों ने मेरे लिए किया ही क्या है? हर समय बस एहसान जताते रहते हो।” मेरे इतना कहते ही माँ का चेहरा उतर गया। उनकी आँखें भर आईं, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप रसोई में चली गईं। और उस समय… मुझे लगा कि मैं सही हूँ। गुस्से में इंसान खुद को गलत मान ही नहीं पाता। मैं बिना कुछ खाए ऑफिस चली गई। रास्ते भर मन खराब था, लेकिन अहंकार उससे भी बड़ा था। एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा कि माँ दरवाजे तक आई थीं या नहीं। दोपहर करीब दो बजे मेरी छोटी बहन का फोन आया। उसकी आवाज काँप रही थी। “दीदी… जल्दी घर आओ।” मैं घबरा गई। “क्या हुआ?” वह रोते हुए बोली— “माँ बेहोश हो गई हैं।” मेरे हाथ काँप गए। मैं जैसे-तैसे घर पहुँची। बाहर कुछ पड़ोसी खड़े थे। अंदर गई तो देखा माँ बिस्तर पर लेटी हुई थीं। डॉक्टर उनके पास बैठे थे। पिताजी एक कोने में बिल्कुल शांत बैठे थे, लेकिन उनके चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी। मैं माँ के पास जाकर बैठ गई। उनका चेहरा बहुत कमजोर लग रहा था। तभी डॉक्टर ने कहा— “इनका ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया था। बहुत ज्यादा मानसिक तनाव में हैं।” “मानसिक तनाव…” ये शब्द मेरे कानों में हथौड़े की तरह गूंजने लगे। और अचानक सुबह कही गई अपनी सारी बातें मुझे याद आने लगीं। “आप लोगों ने मेरे लिए किया ही क्या है…” उस पल पहली बार मुझे एहसास हुआ कि मैंने माँ को कितना दर्द दिया है। कुछ देर बाद माँ को होश आया। उन्होंने आँखें खोलीं। उनकी नजर सबसे पहले मुझ पर पड़ी। और उस हालत में भी उन्होंने धीरे से पूछा— “प्रियंका… तूने खाना खाया?” बस वही पल था जब मैं भीतर से टूट गई। जिस औरत को मैंने सुबह इतना कुछ सुना दिया… वो होश में आते ही मेरी चिंता कर रही थी। मैं तुरंत कमरे से बाहर चली गई क्योंकि मैं उनके सामने रोना नहीं चाहती थी। लेकिन बाहर निकलते ही आँसू रुक नहीं पाए। उस दिन पहली बार समझ आया कि इंसान सबसे ज्यादा चोट उन्हीं लोगों को देता है जो उससे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। रातभर मुझे नींद नहीं आई। मैं माँ के कमरे के बाहर बैठी रही। अंदर हल्की रोशनी जल रही थी। माँ सो रही थीं। मैं उन्हें देखती रही… उनके सफेद होते बाल, चेहरे की थकान, हाथों की झुर्रियाँ… और मुझे अपना बचपन याद आने लगा। कैसे माँ मेरे बुखार में रातभर जागती थीं। कैसे खुद पुरानी साड़ी पहनकर मेरे लिए नए कपड़े लाती थीं। कैसे मेरी हर छोटी खुशी के लिए खुद की इच्छाएँ भूल जाती थीं। और खास उस दिन मैंने उन्हें क्या दिया? अपमान… गुस्सा… दर्द… सुबह करीब चार बजे माँ की आँख खुली। उन्होंने मुझे बाहर बैठे देखा और धीरे से पूछा— “सोई नहीं अभी तक?” मैं अंदर गई, लेकिन उनसे नजरें नहीं मिला पा रही थी। मैंने काँपती आवाज में कहा— “माँ… मुझसे गलती हो गई।” माँ हल्का सा मुस्कुराईं। “माँ से भी कोई माफी मांगता है क्या?” उनकी यही बात मुझे और ज्यादा रुला गई। कुछ लोग बहुत बड़े दिल वाले होते हैं। वे दर्द भूल जाते हैं… लेकिन जिसने दर्द दिया हो, वह कभी नहीं भूल पाता। उस दिन के बाद मैंने कोशिश की कि सब ठीक कर दूँ। मैं ऑफिस से जल्दी घर आने लगी। माँ के साथ बैठती, बातें करती, उनके लिए दवाई लाती। छोटी-छोटी चीजों में उनका ध्यान रखने लगी। लेकिन जिंदगी हर गलती सुधारने का पूरा मौका नहीं देती। करीब छह महीने बाद माँ की तबीयत फिर बिगड़ गई। इस बार उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। डॉक्टरों ने कहा कि उनका दिल बहुत कमजोर हो चुका है। मैं हर समय उनके पास रहती। जब भी वे आँख खोलतीं, मुझे देखकर मुस्कुरा देतीं। जैसे उन्हें मुझसे कोई शिकायत ही न हो। एक रात उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर कहा— “प्रियंका… अपने पिताजी का ध्यान रखना।” मैं तुरंत रो पड़ी। “माँ, आप ठीक हो जाएँगी।” लेकिन शायद माँ सब समझ चुकी थीं। उन्होंने धीरे से कहा— “हर माँ चाहती है कि उसकी बेटी खुश रहे। बस खुद को इतना मत बदल लेना कि अपने ही दूर लगने लगें।” मैं उनका हाथ पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगी। उस रात पहली बार मैंने सिर झुकाकर कहा— “माँ… खास उस दिन मैंने जो कहा था… उसके लिए मुझे माफ कर दो। मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊँगी।” माँ ने काँपते हाथ से मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा— “तू बुरी बेटी नहीं है… बस वक्त बुरा था।” कितना आसान होता है माँ के लिए माफ कर देना… और कितना मुश्किल होता है खुद को माफ करना। तीन दिन बाद माँ इस दुनिया से चली गईं। घर में रिश्तेदार थे, रोने की आवाजें थीं, लेकिन मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। मैं बस माँ के चेहरे को देख रही थी। बिल्कुल शांत… जैसे अब उन्हें कोई दर्द नहीं था। लेकिन दर्द अब मेरे हिस्से में आ चुका था। माँ के जाने के बाद घर वही था, लोग वही थे… लेकिन सब बदल चुका था। अब सुबह कोई आवाज नहीं लगाता था— “प्रियंका, नाश्ता कर ले।” अब देर रात आने पर कोई दरवाजे पर इंतजार नहीं करता था। अब बीमार होने पर कोई बार-बार फोन नहीं करता था। पहले जो बातें मुझे रोक-टोक लगती थीं… आज उन्हीं के लिए दिल तरसता था। कई बार रात को मैं माँ के पुराने मैसेज पढ़ती। “समय से खाना खा लेना।” “ज्यादा काम मत करना।” “घर जल्दी आ जाना।” पहले ये सामान्य शब्द लगते थे… लेकिन आज इन्हीं शब्दों में पूरा प्यार दिखाई देता है। एक दिन अलमारी साफ करते समय मुझे माँ की डायरी मिली। उसमें ज्यादा कुछ नहीं लिखा था। बस छोटे-छोटे नोट्स थे। एक पन्ने पर लिखा था— “आज प्रियंका बहुत गुस्से में थी। शायद किसी परेशानी में है। भगवान करे उसका मन शांत हो जाए।” मैं वहीं बैठकर रो पड़ी। जिस दिन मैंने उन्हें सबसे ज्यादा दुख दिया… उस दिन भी उन्हें अपनी नहीं, मेरी चिंता थी। उस डायरी के हर पन्ने ने मुझे अंदर से तोड़ दिया। आज माँ को गए पाँच साल हो चुके हैं। अब मैं खुद एक माँ हूँ। जब मेरी बेटी मुझसे नाराज होकर ऊँची आवाज में बात करती है और कुछ देर बाद आकर गले लग जाती है, तब मुझे माँ याद आती हैं। जब मैं रातभर अपनी बच्ची के सिरहाने बैठी रहती हूँ, तब समझ आता है कि माँ का प्यार कभी कम नहीं होता… चाहे बच्चा उन्हें कितना भी दुख क्यों न दे दे। लेकिन बच्चे अक्सर देर से समझते हैं। बहुत देर से। आज भी हर साल माँ की बरसी पर मैं उनके कमरे में जाकर कुछ देर अकेली बैठती हूँ। उनकी पुरानी चश्मा, पूजा की माला, दवाईयों का डिब्बा… सब वैसे ही रखा है। और हर बार मन में वही एक बात गूंजती है— “खास उस दिन मैंने अपने शब्दों को रोक लिया होता…” “खास उस दिन मैंने माँ को गले लगा लिया होता…” “खास उस दिन मैंने यह समझ लिया होता कि चिंता प्यार का दूसरा नाम होती है…” लेकिन जिंदगी “खास उस दिन” दोबारा वापस नहीं लाती। वह सिर्फ यादें छोड़ती है… और कुछ ऐसे पछतावे, जो इंसान उम्रभर अपने भीतर ढोता रहता है।

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मेरी डायरी

: प्रियंका चौधरी
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