श्मशान घाट की आग धीरे-धीरे बुझ रही थी। आरव अपने पिता की चिता के सामने खड़ा था। आंखों में आँसू थे, पर दिल में खालीपन ज्यादा था। पिता हमेशा कहते थे — “हर अंत, किसी नए आरम्भ का दरवाज़ा होता है बेटा।” लेकिन आज आरव को ये बात झूठ लग रही थी। जिस इंसान ने उसे चलना सिखाया, वही आज हमेशा के लिए चला गया था। घर लौटते समय उसकी नज़र पिता की पुरानी डायरी पर पड़ी। कांपते हाथों से उसने पहला पन्ना खोला। उसमें लिखा था — “अगर ये डायरी तुम पढ़ रहे हो, तो समझो मेरा अंत हो चुका है। लेकिन बेटा, मेरा जाना तुम्हें रोकने के लिए नहीं… आगे बढ़ाने के लिए है। मैंने पूरी ज़िंदगी दूसरों के सपनों में खुद को खो दिया। तुम ऐसा मत करना। अपना सपना जीना… क्योंकि अंत ही आरम्भ है।” आरव की आँखों से आँसू टपक पड़े। उसे याद आया — वह बचपन से लेखक बनना चाहता था, लेकिन नौकरी और जिम्मेदारियों में खुद को भूल चुका था। उस रात, कई महीनों बाद उसने फिर से कलम उठाई। खिड़की के बाहर सुबह की पहली किरण फैल रही थी। आज एक बेटे ने अपने पिता को खोया था… लेकिन उसी पल, एक लेखक का जन्म हुआ था।
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