खुद की पहचान

भीड़ से भरे शहर में किरण हर दिन हजारों चेहरों के बीच रहती थीं, पर उसे हमेशा लगता, “मैं आखिर हूँ कौन?” सुबह ऑफिस, शाम घर, और रात को मोबाइल की चमक में खो जाना… जिंदगी जैसे बस आदत बन गई थी। उसके चेहरे पर मुस्कान रहती, लेकिन अंदर एक खालीपन हर पल उसे काटता रहता। एक दिन ऑफिस से लौटते वक्त उसने सड़क किनारे बैठे एक बूढ़े चित्रकार को देखा। वो पुराने कागज़ पर रंग भर रहा था। किरण ने पूछा, “बाबा, इतनी उम्र में भी ये सब क्यों करते हो?” बूढ़ा मुस्कुराया और बोला, “क्योंकि बेटा, जब मैं रंग बनाता हूँ, तब मुझे याद आता है कि मैं कौन हूँ।” ये शब्द किरण के दिल में उतर गए। उस रात उसने वर्षों बाद अपनी पुरानी डायरी निकाली। उसमें उसके बचपन के सपने लिखे थे, “मुझे कहानियाँ लिखना पसंद है… मैं लोगों के दिल छूना चाहती हूँ।” किरण देर तक डायरी को देखती रही । उसे एहसास हुआ कि दुनिया को खुश करने की दौड़ में वो खुद को ही भूल चुकी थीं । अगले दिन उसने फिर से लिखना शुरू किया। धीरे-धीरे उसकी कहानियाँ लोगों तक पहुँचने लगीं। हर शब्द के साथ उसे अपना खोया हुआ अस्तित्व वापस मिलने लगा। अब भी उसकी जिंदगी साधारण थी, पर फर्क इतना था कि अब वो खुद से दूर नहीं था। क्योंकि इंसान की सबसे बड़ी मंज़िल दुनिया में जगह बनाना नहीं, बल्कि खुद के भीतर अपनी पहचान ढूँढ लेना है।


: रेखा गुप्ता
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