कभी हंसी से गूंजने वाला एक छोटा सा आंगन… आज खामोश है। पांच साल बाद जब एक बेटा अपने घर लौटता है, तो उसे एहसास होता है कि वक्त सिर्फ लोगों को नहीं, रिश्तों को भी बदल देता है। कुछ इंतजार अधूरे रह जाते हैं, कुछ रिश्ते टूट जाते हैं, और कुछ दर्द इंसान अपने अंदर ही दफना लेता है। यह कहानी है परिवार, इंतजार, अधूरे रिश्तों, त्याग और उस प्रेम की… जो शब्दों से नहीं, एहसासों से जिया जाता है। एक ऐसी कहानी, जो आपको गांव की मिट्टी की खुशबू भी महसूस कराएगी और रिश्तों के दर्द से अंदर तक छू भी जाएगी।
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