समर्पण

“नई दहलीज़” बारिश की हल्की बूंदें आंगन की मिट्टी पर गिर रही थीं। घर के बाहर लगी रंगोली आधी बह चुकी थी, लेकिन दरवाज़े पर टंगी गेंदे की मालाएं अब भी नई दुल्हन के स्वागत की गवाही दे रही थीं। संध्या ने धीरे से कार से नीचे कदम रखा। पैरों में पायल की हल्की आवाज हुई और उसने घूंघट के पीछे से उस बड़े से घर को देखा, जो अब उसका अपना घर कहलाने वाला था। घर बड़ा था… बहुत बड़ा। लेकिन न जाने क्यों उसे उस घर में एक अजीब सी खामोशी महसूस हुई। “बहू… आरती का थाल इधर है।” एक तेज लेकिन थकी हुई आवाज सुनाई दी। संध्या ने नजर उठाई। दरवाजे पर खड़ी महिला शायद उसकी सास थीं — सावित्री देवी। चेहरा कमजोर, आंखों के नीचे गहरे काले घेरे और हाथों में कंपन। संध्या ने तुरंत उनके पैर छुए। सावित्री देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा, लेकिन मुस्कान अधूरी थी… जैसे शरीर यहां था और मन कहीं और। उसी समय पीछे से एक लड़का भागते हुए आया। “भैया! डॉक्टर फिर फोन कर रहे हैं…” वह लगभग उन्नीस-बीस साल का रहा होगा। विक्रम तुरंत घबराकर उसकी तरफ बढ़ा। “आरव, मैंने कहा था ना अभी फोन मत करना।” संध्या ने पहली बार अपने पति के चेहरे को गौर से देखा। शादी के पूरे समय वह रिश्तेदारों और जिम्मेदारियों में इतना उलझा रहा कि शायद दोनों ठीक से बात भी नहीं कर पाए थे। आज भी उसके चेहरे पर दूल्हे वाली खुशी नहीं… चिंता थी। तभी पीछे से एक छोटी सी लड़की आई और संध्या का हाथ पकड़ लिया। “भाभी… आप सच में यहीं रहने वाली हो ना?” संध्या हल्का सा मुस्कुराई। “हां।” लड़की की आंखें चमक उठीं। “अच्छा है… अब घर में कोई तो होगा।” यह सुनकर अचानक आसपास खड़े कुछ रिश्तेदार चुप हो गए। संध्या समझ नहीं पाई… लेकिन अगले ही पल उसकी नजर सावित्री देवी पर गई। वह तेजी से खांसने लगी थीं। घर में अचानक अफरा-तफरी मच गई। “मां!” विक्रम दौड़ा। आरव पानी लाया। छोटी छवि डरकर संध्या के पीछे छिप गई। और संध्या… वह पहली बार उस घर में खड़ी होकर समझ गई — यह सिर्फ शादी नहीं है। यह किसी बिखरते हुए घर में कदम रखना है। रात काफी देर तक घर में हलचल रही। डॉक्टर आए। दवाइयां चलीं। रिश्तेदार धीरे-धीरे चले गए। नई दुल्हन का कमरा फूलों से सजा था… लेकिन उस कमरे में इंतजार नहीं था। विक्रम आधी रात तक मां के कमरे में बैठा रहा। संध्या कमरे में अकेली बैठी रही। हाथों की मेहंदी अभी गहरी थी… लेकिन दिल में अजीब खालीपन उतरने लगा था। तभी दरवाजा धीरे से खुला। विक्रम अंदर आया। चेहरा थका हुआ था। “सॉरी…” बस यही एक शब्द निकला उसके मुंह से। संध्या ने कुछ नहीं कहा। विक्रम कुछ पल चुप रहा, फिर बोला — “मां बहुत समय से बीमार हैं… घर थोड़ा… उलझा हुआ है।” “मैं समझ सकती हूं,” संध्या ने धीमे स्वर में कहा। विक्रम पहली बार उसकी तरफ देखता रह गया। न शिकायत। न नाराज़गी। सिर्फ शांति। शायद यही चीज उसे भीतर कहीं छू गई। लेकिन अगले ही पल नीचे से आवाज आई — “भैया! मां फिर बुला रही हैं…” विक्रम तुरंत उठ गया। “मैं अभी आता हूं।” और वह चला गया। दरवाजा फिर बंद हो गया। कमरे में फिर वही खामोशी लौट आई। संध्या ने धीरे से सामने रखे आईने में खुद को देखा। हर लड़की शादी की पहली रात हजार सपने लेकर आती है… लेकिन उसकी पहली रात जिम्मेदारियों की आहट लेकर आई थी। उसे नहीं पता था कि आने वाले सालों में — वह इस घर की बहू कम… और इस घर की नींव ज्यादा बन जाएगी

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उपन्यास

: Rekha bishnoi
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