ये गालिब की ज़मीन और आपकी गहरी सोच का एक खूबसूरत तालमेल है। "गमे-ज़िंदगी" (जीवन का दुख) जब मशवरा मांगने लगे, तो समझो कि इंसान अब थक कर नहीं, बल्कि संभल कर चलना चाहता है।
1. ये गमे जिंदगी.. कुछ तो दे मशवरा 15 | 3 | 3 | 5 | | 07-05-2026 |
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