ज़र्रा मात्र हूँ!

मैं शब्द नहीं लिखती, मैं भावों को जीती हूँ। मेरी कविताएँ मेरे भीतर के उन सवालों की आवाज़ हैं, जो अक्सर खामोशी में जन्म लेते हैं। “ज़र्रा मात्र हूँ” लेकिन उसी ज़र्रे में पूरी एक दुनिया समेटे हुए। पढ़िए, आनंद लीजिए♥️

53 Views
Time : 8 Min

कविता

: Drama Hub
img