यादें

तुम्हारी यादें…! कमबख्त,अब जाती ही नहीं है। तुमसे क्या मिला, बस मैं अब मैं नहीं रहा। तुम्हारे यादें…! अब मेरी परछाई बन गई है। दिन को चैन,और रात की नींद उड़ा ले गई है। तुम्हारे यादों का क्या करूं? खैर,तुम नहीं तो तुम्हारे यादें ही सही। मुझे विश्वास है। इस दिल को ऐतबार है। कभी तो तुम मुझसे मिलोगी, और जरिया बनेगी। तुम्हारी यादें…! : कुमार किशन कीर्ति

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कविता

: Kumar Kishan Kirti
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