तुम नही समझोगे

तुम नहीं समझोगे हर रात मैं जग जाता हूं कुछ बैचेन सा हो जाता हूँ कुछ बातें है दिल में जो तुमसे नहीं कह पता हूँ कुछ उलझन में खुद को पता हूँ तुम नहीं समझोगी ये सोच कर कुछ नहीं कह पता हुआ एक तूफ़ान उलझन का मैंने किसी और को भी देखा है कितना भी गया दूर हर मोड़ पर वो टकराता है है कोई नहीं संबंध फ़िर भी वो मेरी और खिचा चला आता है मैं नहीं गुनेहगार तेरा तू गलत मत समझ मुझे ये तो दर्द का रिश्ता है मैं और जन्म जन्मो का नाता है तुम नहीं समझोगे कुछ तो अधूरा है कुछ तो कर्ज़ चुकाना है याद नहीं आता वो गुजरा हुआ जमाना है तुम नहीं समझोगे ये कर्ज़ पुराना है और मुझको ही चुकाना है ।

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कविता

लेखक : yogesh
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