राख की जिंदा चीखें

दिल्ली से आए एक नौजवान कपल, राहुल और मीरा, सपनों का घर तलाशते हुए कालिगढ़ नाम के सुनसान गाँव में एक पुराना, जला हुआ बंगला खरीद लेते हैं। सस्ता दाम, शांत माहौल... लेकिन गाँव वाले चुप्पी साध जाते हैं। पहली रात से ही दीवारों से राख झरने लगती है। हवा में माँस जलने की तेज गंध। आईनों में एक जलती हुई लड़की की चीखें गूँजती हैं – “बचाओ... मुझे जला रहे हैं...” हर वो जोड़ा – शादीशुदा या अनमैरिड – जो इस घर में कदम रखता है, आग की लपटों में जलकर राख हो जाता है। राहुल और मीरा को भी अब वही किस्मत नजर आ रही है। रातें लंबी होती जा रही हैं। उनकी त्वचा पर जलने के निशान बन रहे हैं। दीवारें चीख रही हैं और प्रिया... वो हर आईने, हर छाया, हर साँस में मौजूद है। ये कहानी इतनी भयानक, इतनी visceral कि आप किताब बंद करके भी आग की गंध महसूस करेंगे। सच्चाई किसी भूत से कहीं ज्यादा डरावनी है। क्योंकि कभी-कभी सबसे बड़ा भूत इंसान की क्रूरता और बदले की आग ही होता है। राख की जिंदा चीखें – वो चीख जो कभी खत्म नहीं होती। जो राख में भी जिंदा रहती है। Warning: रात में अकेले मत पढ़ना। दीवारों पर नजर रखना और आग की गंध आने पर... भाग जाना।

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Time : 3 Hour

21dayschallenge

: अज्ञात
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