श्रृंगार दुल्हन का

दर्पण के सामने बैठी वह, अप्सरा सी सज रही है, हाथों में खनकती चूड़ियाँ, एक नया राग रच रही हैं। माथे पर बिंदिया चमकती है, जैसे भोर का तारा हो, पर उसी मस्तक के पीछे, ख्यालों का एक दरिया गहरा हो।

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कविता

लेखक : Simple Human
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