KALKI

रतनपुर गांव की सरहद पर खड़ी वह 'सूर्यगढ़ हवेली' किसी सोए हुए राक्षस जैसी लग रही थी। रात के सन्नाटे में झींगुरों की आवाज़ और दूर कहीं कुत्तों के रोने का स्वर वातावरण को और भी भयानक बना रहा था। 24 साल का आर्यन अपनी पुरानी जीप से उतरा। उसके हाथ में एक पुराना वसीयतनामा था और आंखों में ढेर सारी उलझनें। ​शहर की चकाचौंध से दूर, इस वीरान गांव में उसे उसके दादाजी की आखिरी ख्वाहिश खींच लाई थी "बेटा, चाहे कुछ भी हो जाए, उस हवेली को कभी बिकने मत देना। वह सिर्फ पत्थर की इमारत नहीं, एक पहरा है।" ​आर्यन ने हवेली के विशाल लकड़ी के दरवाज़े पर हाथ रखा। जैसे ही उसके हाथ की खाल उस पुरानी लकड़ी से छुई, उसे एक ज़ोरदार बिजली के झटके का अहसास हुआ। उसके बाएं हाथ की कलाई पर जन्म से बना वह 'तलवार और सूरज' वाला निशान अचानक दहकने लगा। ​"आह!" आर्यन ने अपना हाथ पीछे खींच लिया। निशान गहरा लाल हो चुका था। ​उसने हिम्मत जुटाई और दरवाज़ा धकेला। चर्रर्र... की आवाज़ पूरे सन्नाटे में गूंज उठी। हवेली के अंदर धूल भरी हवा और सीलन की महक थी। आर्यन ने अपनी टॉर्च जलाई। रोशनी जहां-जहां जा रही थी, वहां सिर्फ मकड़ी के जाले और पुरानी तस्वीरें दिख रही थीं। ​तभी, हवेली की ऊपरी मंज़िल से किसी के चलने की आहट आई। पायल की छन-छन... और फिर एक ठंडी, सिसकती हुई आवाज़। ​"तुम आ गए... दशम अवतार..." ​आर्यन के रोंगटे खड़े हो गए। "कौन है वहां?" उसने चिल्लाकर पूछा, लेकिन जवाब में सिर्फ सन्नाटा मिला। ​वह धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगा। हर कदम के साथ उसे महसूस हो रहा था कि दीवारें उसे देख रही हैं। तभी एक कमरे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया। अंदर एक आदमकद आईना लगा था। आर्यन जैसे ही आईने के सामने पहुंचा, उसने देखा कि आईने में उसकी परछाई के पीछे एक काला धुआं जैसा साया खड़ा है। ​उस साये की आंखें नहीं थीं, सिर्फ जलते हुए अंगारे थे। वह 'कलि-दूत' था। कलि पुरुष का वह सेवक जिसे सिर्फ विनाश करना आता था। ​इससे पहले कि आर्यन कुछ समझ पाता, उस साये ने अपना बर्फीला हाथ आर्यन के गले पर रख दिया। आर्यन की सांसें रुकने लगीं। उसे लगा कि आज उसकी मौत पक्की है। तभी, हवेली की छत से एक दिव्य प्रकाश फूटा। ​"पीछे हटो, अधर्मी!" एक सुरीली मगर गरजती हुई आवाज़ गूंजी। ​एक चमकता हुआ सुनहरा खंजर हवा को चीरता हुआ आया और सीधे उस साये के सीने में जा धंसा। वह साया एक भयानक चीख के साथ धुएं में बदल गया। आर्यन ज़मीन पर गिरकर हांफने लगा। ​उसने नज़रें उठाईं। हवेली के झरोखे पर एक लड़की खड़ी थी। उसने गहरे नीले और सुनहरे रंग का राजस्थानी घाघरा पहना था। उसके माथे पर एक छोटा सा तिलक था जो अंधेरे में भी चमक रहा था। उसकी आंखों में एक ऐसी करुणा और शक्ति थी जो आर्यन ने पहले कभी नहीं देखी थी। ​"मीरा?" आर्यन के मुंह से अनजाने में यह नाम निकला, जैसे वह उसे सदियों से जानता हो। ​लड़की नीचे उतरी। उसके हर कदम के साथ हवेली की धूल गायब हो रही थी और वहां मोगरे की धीमी खुशबू फैल रही थी। ​"तुम्हें अपना नाम याद है, पर अपना कर्तव्य नहीं, आर्यन?" मीरा ने पास आकर उसके माथे पर हाथ रखा। स्पर्श इतना पवित्र था कि आर्यन का सारा डर गायब हो गया। "मैं मीरा हूँ, जिसे तुम 'त्रिकुटा' के नाम से जानते थे। मैं युगों से इस हवेली में तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ।" ​आर्यन उलझन में था। "त्रिकुटा? वैष्णो देवी? तुम क्या कह रही हो? मैं तो सिर्फ एक मामूली लड़का हूँ।" ​मीरा मुस्कुराई, उसकी मुस्कान में दर्द और प्रेम दोनों थे। "तुम मामूली नहीं हो। कलि पुरुष जाग चुका है और वह पूरी दुनिया को अंधकार में डूबने से पहले तुम्हें खत्म करना चाहता है। आज की रात सिर्फ शुरुआत है।" ​तभी, हवेली के बाहर हज़ारों कौवों के कांव-कांव करने की आवाज़ आई। आसमान काला हो गया। हवेली के मुख्य द्वार पर कोयले से अपने आप कुछ अक्षर उकर आए: 'कलि आ रहा है।'

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Time : 40 Min

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लेखक : Anu
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