बड़ी रफ्तार से ट्रेन पटरियों पर फिसलती हुई आगे बढ़ रही थी। खिड़की के पास बैठा अंश बाहर भागते दृश्य नहीं देख रहा था; उसकी आँखें खुली थीं, मगर मन कहीं और भटक रहा था। भीतर एक अनकहा तूफ़ान उठ रहा था—सवालों, डर और उम्मीदों का। ऐसे सवाल, जिनके जवाब शायद समय भी टाल देना चाहता था।
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