Unwanted marriage

रात के सन्नाटे को चीरती हुई रघुवंशी हवेली की विशाल दीवार घड़ी ने जैसे ही ग्यारह का ऐलान किया, अवनि का दिल एक बार फिर ज़ोर से काँप उठा। धक… धक… धक… यह धड़कन डर की थी या इंतज़ार की — वह खुद भी नहीं समझ पा रही थी। रसोई की खुली खिड़की से ठंडी हवा के झोंके अंदर आ रहे थे, मगर अवनि के माथे पर पसीने की महीन बूंदें चमक रही थीं। पिछले तीन घंटों से वह वहीं खड़ी थी — कभी चूल्हे पर चढ़े बर्तन देखती, कभी घड़ी की ओर। आज उसने विराज के हर पसंदीदा पकवान बनाए थे। दाल मखनी, शाही पनीर, केसरिया चावल… हर मसाले में जैसे उसने अपना धैर्य और अपनी उम्मीदें घोल दी थीं। तीन महीने पहले जब वह इस हवेली की बहू बनकर आई थी, तब उसने कभी नहीं सोचा था कि इतने आलीशान घर के भीतर इतनी खामोशी बसती होगी। उसने अपनी मलमल की ओढ़नी से चेहरा पोंछा और फिर से चूल्हे की ओर मुड़ ही रही थी कि— “भाभी… अभी तक सोई नहीं तुम?” हॉल से आई वह धीमी, मुलायम आवाज़ सुनकर अवनि चौंक गई। पीछे मुड़कर देखा तो निशु खड़ी थी। विराज की छोटी बहन… और इस घर में अवनि की इकलौती हमदर्द। “निशु… तुम अभी तक जाग रही हो?” अवनि ने मुस्कुराने की कोशिश की। “कल तुम्हारी परीक्षा है न?” “भाभी…” निशु ने हिचकते हुए कहा, “भाई अभी तक नहीं आए… आप कब तक उनका इंतज़ार करती रहेंगी?” वह रुक गई। कुछ बातें बिना कहे ही बहुत कुछ कह जाती हैं। “आते ही होंगे,” अवनि ने बात टाल दी। “तुम जाओ, सो जाओ।” निशु चुपचाप चली गई। और रसोई में फिर वही सन्नाटा उतर आया। अवनि ने डाइनिंग टेबल को फिर से सजाया। लेकिन काँच के बर्तनों में सजी गर्माहट अब ठंडी पड़ चुकी थी — बिल्कुल उसके और विराज के रिश्ते की तरह। तभी… बाहर अचानक एक महँगी स्पोर्ट्स कार के टायरों की तीखी आवाज़ गूँजी। अवनि का हाथ काँप गया। विराज आ गया था। दिल जैसे सीने से बाहर निकल आएगा। उसने जल्दी से अपने बाल ठीक किए, ओढ़नी सँभाली और भारी दरवाज़े की ओर दौड़ी। दरवाज़ा खुलते ही शराब और महँगे परफ्यूम की मिली-जुली गंध उसके नथुनों से टकराई। विराज सिंह रघुवंशी… शहर का सबसे बड़ा रियल एस्टेट टाइकून… लड़खड़ाते क़दमों से अंदर आया। कोट कंधे पर लटका था, सफेद शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले हुए, आँखों में थकान और गुस्से की लालिमा। “आप… आप आ गए?” अवनि ने बहुत नरम आवाज़ में कहा। “हाथ-मुँह धो लीजिए… मैं खाना लगाती हूँ…” वह उसका कोट लेने के लिए आगे बढ़ी। लेकिन जैसे ही उसकी उँगलियाँ विराज की बाँह से छुईं— उसने झटके से उसे पीछे धकेल दिया। अवनि का संतुलन बिगड़ा और वह दीवार से जा टकराई। “कहा था न मैंने…” विराज की आवाज़ में ज़हर घुला था, “मेरा इंतज़ार मत किया करो!” अवनि की आँखें भर आईं। “तुम्हें क्या लगता है,” वह उसके क़रीब आया, “ये सब नाटक करके… खाना बनाकर… तुम इस घर की असली बहू बन जाओगी?” “मैं नाटक नहीं कर रही…” अवनि की आवाज़ काँप रही थी। “आप सुबह से बाहर थे… मैंने सोचा…” “सोचने का हक किसने दिया तुम्हें?” वह और पास आ गया। “तुम्हें बस इस घर की तिजोरी और अपनी ऐश से मतलब होना चाहिए।” उसकी आँखों में झाँकते हुए वह फुसफुसाया— “हम दोनों जानते हैं कि हमारी शादी क्यों हुई है।” अवनि की पलकों से आँसू गिर पड़े। “बाबूजी की आख़िरी इच्छा थी…” उसने धीमे से कहा। “मेरे पिता की मजबूरी का फ़ायदा उठाया है तुम्हारे परिवार ने!” विराज दहाड़ा। “एक गरीब लड़की को मेरे गले मढ़ दिया गया ताकि मैं सुधर जाऊँ? देखो मुझे… सुधरा हुआ लगता हूँ?” तभी ऊपर बालकनी की लाइट जली। सुमित्रा देवी सीढ़ियों से उतर रही थीं। “बस करो विराज!” उनकी आवाज़ में सख़्ती थी। “बहू सुबह से भूखी बैठी है… और तुम इसे अपमानित कर रहे हो?” विराज हँस पड़ा। “माँ… ज़रा इससे पूछिए… इसके भाई ने मुझसे बिज़नेस के लिए कितने पैसे उधार लिए हैं?” अवनि का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। सच था… “चुप रहो!” सुमित्रा देवी ने उसका कंधा थामा। “बहू, तू ऊपर जा।” “नहीं माँ जी…” अवनि ने आँसू पोंछते हुए कहा, “मैं खाना पहुँचा देती हूँ…” कुछ देर बाद… विराज के कमरे का दरवाज़ा खुला। अवनि ने ट्रे रखी। विराज बालकनी में सिगरेट पी रहा था। तभी उसकी नज़र मेज़ पर पड़ी एक डायरी पर गई… और उसमें से झाँकती एक पुरानी तस्वीर पर। उसने काँपते हाथों से फोटो निकाली। फोटो में विराज था… मुस्कुराता हुआ… और उसके पास एक बेहद खूबसूरत लड़की। पीछे लिखा था— “हमेशा के लिए तुम्हारी — अंतरा” अवनि की साँस रुक गई। तो यही है वो… पीछे से विराज की आवाज़ आई— “किसने इजाज़त दी तुम्हें मेरी चीज़ें छूने की?” उसने फोटो छीन ली। इस बार उसकी आँखों में गुस्सा नहीं… बल्कि टूटन थी। “ये कौन है?” अवनि ने हिम्मत करके पूछा। विराज ने उसे दीवार से सटा दिया। और उसकी आँखों में देखते हुए कहा— “ये वो है… जिसे मैं कभी भुला नहीं पाया।” फिर ठंडे स्वर में— “और तुम वो हो… जिसे मैं कभी अपना नहीं सकूँगा।” उसने दरवाज़े की ओर इशारा किया। “चली जाओ… इससे पहले कि मैं खुद को पूरी तरह खो दूँ…”


: Annu
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