क्या प्रेम सिर्फ़ चाँद-तारों की बात है? शायद नहीं। यह सीरीज़ प्रेम के उस 'यथार्थवादी' चेहरे को बेपर्दा करती है, जो किताबों में कम और ज़िंदगी में ज़्यादा मिलता है। इसमें शामिल 21 कविताएँ उदासी, उलझन, असुरक्षा और उस मौन की दास्तां हैं, जो दो दिलों के बीच पनपता है। यह उन अनकहे जज़्बातों का दस्तावेज़ है, जहाँ 'मैं' और 'तुम' मिटकर धीरे-धीरे 'हम' बनते हैं।
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