पिंजरा

“पिंजरा” केवल लोहे की सलाखों की कथा नहीं है, यह उस अदृश्य कैद की कहानी है जिसमें मनुष्य जन्म से बंधा रहता है। इस काव्य-श्रृंखला के 11 अध्याय बचपन की सीमाओं से लेकर समाज, स्त्री-पुरुष की भूमिकाओं, प्रेम, भय और आत्मा की गहरी कैद तक की यात्रा करते हैं।

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कविता

: अज्ञात
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