“पिंजरा” केवल लोहे की सलाखों की कथा नहीं है, यह उस अदृश्य कैद की कहानी है जिसमें मनुष्य जन्म से बंधा रहता है। इस काव्य-श्रृंखला के 11 अध्याय बचपन की सीमाओं से लेकर समाज, स्त्री-पुरुष की भूमिकाओं, प्रेम, भय और आत्मा की गहरी कैद तक की यात्रा करते हैं।
1. पिंजरा — विवरण 6 | 6 | 6 | 5 | | 06-01-2026 |
2. अध्याय 1 : पहली सलाख 5 | 3 | 3 | 5 | | 06-01-2026 |
3. अध्याय 2 : बचपन का पिंजरा 3 | 3 | 3 | 5 | | 06-01-2026 |
4. अध्याय 3 : समाज की सलाखें 3 | 3 | 3 | 5 | | 06-01-2026 |
5. अध्याय 4 : स्त्री का पिंजरा 3 | 3 | 3 | 5 | | 06-01-2026 |
6. अध्याय 5 : पुरुष का पिंजरा 3 | 3 | 3 | 5 | | 06-01-2026 |
7. अध्याय 6 : प्रेम का पिंजरा 3 | 3 | 3 | 5 | | 06-01-2026 |
8. अध्याय 7 : भय का पिंजरा 3 | 3 | 3 | 5 | | 06-01-2026 |
9. अध्याय 8 : आत्मा की कैद 4 | 3 | 3 | 5 | | 06-01-2026 |
10. अध्याय 9 : बग़ावत 4 | 3 | 3 | 5 | | 06-01-2026 |
11. अध्याय 10 : टूटता पिंजरा 3 | 3 | 3 | 5 | | 06-01-2026 |
12. अध्याय 11 : उड़ान 5 | 3 | 3 | 5 | | 06-01-2026 |
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