आबिद और पिहू बचपन में एक ही आत्मा के दो अविभाज्य टुकड़े थे, जब तक कि दस वर्ष की उम्र में किस्मत की एक क्रूर चाल ने उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं कर दिया। जहाँ आबिद शाही प्रभाव के एक ऊँचे पद तक पहुँचा, वहीं पिहू को चुरा कर लाल-बत्ती इलाके की परछाइयों में धकेल दिया गया। वहाँ उसने मानव पीड़ा की मूक साक्षी बनकर, अपनी स्वयं सीखी चिकित्सा-कला से समाज द्वारा भुला दिए गए लोगों का इलाज किया।
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