इत्तेफाक से मोहब्बत

कुछ दिन ज़िंदगी में ऐसे आते हैं जिनके आने की कोई आहट नहीं होती। ना कोई संकेत, ना कोई चेतावनी। वो बस आते हैं… और सब कुछ बदल देते हैं। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था। सुबह आसमान भारी था। बादल इतने नीचे झुके हुए थे जैसे शहर से कुछ कहने आए हों, लेकिन शब्दों की जगह चुप्पी लेकर। हवा में नमी थी, एक अजीब-सी बेचैनी थी—जैसे कुछ होने वाला हो, लेकिन क्या… ये किसी को नहीं पता था। रेलवे स्टेशन हमेशा की तरह ज़िंदा था। अनाउंसमेंट की आवाज़ें, लोगों की भागती चालें, प्लेटफॉर्म पर खिंचती ज़िंदगियाँ। हर कोई कहीं पहुँचने की जल्दी में था, कोई किसी से मिलने, कोई किसी से दूर जाने। उसी भीड़ में आर्या खड़ी थी। नज़रें सामने थीं, लेकिन देख कुछ नहीं रही थीं। हाथ में पकड़ा बैग हल्का था, पर दिल… बहुत भारी। उसके चेहरे पर उदासी नहीं थी, बस वो थकान थी जो तब आती है जब इंसान बहुत कुछ सह चुका हो और अब लड़ने की ताक़त भी कम पड़ने लगी हो। ये शहर कभी उसका सपना था—नौकरी, आज़ादी, नई शुरुआत। लेकिन आज वही शहर उसे बोझ लग रहा था। नौकरी चली गई थी, भरोसे टूट चुके थे, और जिन लोगों के लिए वो रुकी थी… वो कब के आगे बढ़ चुके थे। आज आर्या जा रही थी। कहाँ—ये भी साफ़ नहीं था। बस यहाँ से दूर। उसने घड़ी देखी। ट्रेन आने में कुछ ही मिनट थे। एक गहरी साँस उसके होंठों से फिसल गई। “शायद… यही सही है,” उसने मन ही मन कहा, जैसे खुद को समझा रही हो। उसी प्लेटफॉर्म के दूसरे सिरे पर रुद्राक्ष खड़ा था। लंबा कद, सादा कपड़े, और आँखों में वो सख़्ती जो अनुभव से आती है। वो उन लोगों में से था जो ज़िंदगी को भावनाओं से नहीं, तर्क से जीते हैं। जिनके लिए रिश्ते एक ज़िम्मेदारी होते हैं, और मोहब्बत… एक जोखिम। उसके फोन पर किसी की आवाज़ लगातार बोल रही थी—भविष्य, शादी, सेटल होने की बातें। रुद्राक्ष का जवाब छोटा और ठंडा था। “मुझे अभी किसी बंधन में नहीं बंधना।” फोन कटते ही उसने जबड़ा भींच लिया। उसे ये बातें पसंद नहीं थीं, लेकिन हर बार वही चर्चा, वही दबाव। तभी बारिश की पहली बूँद उसकी कलाई पर गिरी। उसने ऊपर देखा। आसमान और भी गहरा हो चुका था। और उसी पल ट्रेन प्लेटफॉर्म पर दाख़िल हुई। भीड़ में अचानक हलचल मच गई। लोग एक-दूसरे से टकराते हुए आगे बढ़ने लगे। आवाज़ें तेज़ हो गईं, कदमों की रफ़्तार बढ़ गई। आर्या ने भी आगे बढ़ने की कोशिश की। तभी पीछे से किसी ने ज़ोर का धक्का दे दिया। उसका बैग हाथ से छूट गया, संतुलन बिगड़ा, और वो गिरने ही वाली थी कि किसी ने उसे थाम लिया। मजबूत पकड़। अचानक थम गई दुनिया। आर्या की साँस अटक गई। उसने चौंककर ऊपर देखा। सामने रुद्राक्ष था। उसकी आँखों में कोई सवाल नहीं था, बस एक गहरी स्थिरता। रुद्राक्ष ने भी उसे देखा—और एक पल के लिए कुछ ऐसा महसूस किया जो उसे अजीब लगा। एक अनजानी बेचैनी, एक अनकहा जुड़ाव। आर्या ने जल्दी से खुद को संभाला। “सॉरी,” उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें घबराहट साफ़ थी। रुद्राक्ष ने कुछ नहीं कहा। उसने बस झुककर बैग उठाया और उसकी ओर बढ़ा दिया। उँगलियाँ टकराईं—हल्का-सा स्पर्श, लेकिन असर गहरा। ट्रेन का हॉर्न बजा। आर्या चौंकी। “मुझे जाना है,” वो लगभग खुद से बोली और जल्दी से ट्रेन में चढ़ गई। दरवाज़ा बंद हुआ। ट्रेन चल पड़ी। प्लेटफॉर्म पर रुद्राक्ष वहीं खड़ा रह गया। उसे उसका नाम नहीं पता था, ये भी नहीं कि वो दोबारा मिलेगी या नहीं। लेकिन कुछ था जो उसके साथ चला नहीं गया—एक खालीपन, एक सवाल, एक एहसास जिसे वो समझ नहीं पा रहा था। उधर ट्रेन की खिड़की से आर्या बाहर देख रही थी। बारिश अब तेज़ हो चुकी थी। प्लेटफॉर्म पीछे छूट रहा था, और उसके दिल में एक अजीब-सा सवाल उभर रहा था—“अजनबी होकर भी… वो पल इतना अपना क्यों लगा?” कुछ मुलाक़ातें बस होती हैं। ना पूछकर आती हैं, ना इजाज़त लेकर दिल में उतरती हैं। और वहीं से शुरू होती है— इत्तेफ़ाक़ से मोहब्बत।

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Kalpana Manthan Pratiyogita 2

: Annu
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