बात है 2024 के शुरुआती महीनों की। मैं उनसे ऑनलाइन मिली थी. कभी सामने नहीं देखा, कभी हाथ नहीं छुआ, उनकी आवाज पर, उनके टेक्स्ट, मेरी जिंदगी का सुकून बन गए थे। जैसी दुनिया का सारा शोर सिर्फ उनको आने से पहले ही पता चल जाता था। मैं उनसे 7 साल छोटी थी, और हम अलग धर्मों के थे। हम हर बात साझा करते थे ख़ुशी, उदासी, हर छोटी भावना बिना सोच के कहते थे। वो कहता था, "हर रिश्ते को लेबल देना ज़रूरी नहीं होता।" और मैं मन जाती थी. क्योंकि मेरे लिए बस वो काफी था। लेकिन अब समझ आया जब नाम नहीं था, तो याद भी नहीं रही। मैं उन्हें ठीक करने निकली थी। उनके अतीत से, उनके दर्द से। और उन्हें संभालते मैं खुद बिखर गयी। सिर्फ 4 महीने का था वो सफर, पर मेरी जिंदगी पलट गई। उनको मुझे हसना सिखाया, जीना सिखाया, मेरे टूटे टुकड़े जोड़े। और फिर एक दिन बिना बताए चले गए। उनके जाने के बाद मेरी दुनिया रुख गई, मेरी रूह काँप गई। 8 महीने तक मैं हसना भूल गई। थेरेपी, डॉक्टर, गोलियां सब कुछ ट्राई किया, पर उनकी यादों का बोझ कम नहीं हुआ। एक दिन हिम्मत जूता कर पूछा, "हम क्या थे?" वो बोले, "कुछ नहीं।" बस हमें एक लफ्ज ने मेरी दुनिया तोड़ दी। जिसके लिए मैं सब कुछ थी, उसके लिए मैं कभी कुछ भी नहीं थी। अब वो शादी कर रहे हैं. और मैं उनके लिए खुश भी हूं, लेकिन अंदर कहीं ना कहीं मेरा दिल हर रोज थोड़ा और टूट जाता है। मैं उनसे नफ़रत नहीं करती. बस उन्हें भूल नहीं पाती. पैनिक अटैक आज भी आते हैं, थेरेपी अब भी चालू है। पर मैं वो वाली "मैं" नहीं रह रही जो पहले थी। बस एक ख्वाहिश है आज भी एक बार उनको शादी के पहले गले लगा के रो इतना राऊ कि मेरा दिल हल्का हो जाए। और कह दूं "देखो, मैं आज भी वही हूं। बस मुस्कुराना भूल गई हूं।" श्वेता अग्रवाल ✍️✍️❤️❤️
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