श्रृंगार

अगर देना चाहो मुझे श्रृंगार के लिए कुछ, तो देना पीपल के पत्तों से बना कंठहार, अमलतास की फुनगियों से बने कंगन, और धूप में सूखे पलाश की बिंदियाँ। ना देना मणि या मणिक्य के हार, देना झरनों की छींटों में चमकती बूंदें, जो गले लगते ही ठंडक दे सकें, मन के ताप को पलभर में हर सकें। अगर लाना चाहो चूड़ियाँ, तो लाना बांस की कोमल डालियाँ मोड़कर, उनमें लपेट देना तुलसी की महक, कि जब भी हाथ हिलें, भक्ति सी गूंज उठे। श्रृंगार में मुझे वो सब कुछ देना, जो साधारण हो पर शाश्वत हो, कि अगर कभी विरह के क्षण आयें, तो वही बेलें, वही फूल मेरी पीड़ा को पी लें, और दे जाएँ अपनी शीतलता... 🌹🌹🌹

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कविता

लेखक : Anu
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