वो मोड़ भी आता है, जब बोझ सहा नहीं जाता, जब आईना भी तुमको, पहचानने से कतराता। जब अपनी ही आवाज़, तुमको खोखली सी लगती है, और हर हँसी के पीछे, एक उदासी जगती है। यही वो पल है जब मन, समाधान को तकता है, अँधेरी इस सुरंग से, बाहर निकलने को मचलता है। जब झूठ का बोझ, सच की हिम्मत से हल्का लगता है, और सच का काँटा भी, फूलों से अच्छा लगता है।
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