एक औरत के झूठे अहंकार ने एक सच्चे आदमी को “ना मर्द” कह दिया। पर वही आदमी, विवेक राठौड़, साबित करता है कि असली मर्दानगी बदले में नहीं, सहनशीलता में होती है। यह कहानी है प्यार, अपमान और आत्मसम्मान की जहाँ जीतता वही है, जो चुप रहकर भी सब देख लेता है।
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