मौन लव स्टोरी❤️ शहर की हलचल से दूर, एक छोटी-सी लाइब्रेरी में हर शाम दो चेहरे मिला करते थे — आरव और सिया। दोनों कभी ज़्यादा बातें नहीं करते थे। बस आमने-सामने बैठकर अपनी-अपनी किताबें पढ़ते थे। पर उस मौन में भी कुछ तो था — एक अनकहा अपनापन, एक अनजाना सुकून। आरव हर रोज़ उसी समय आता, जब सिया की पसंदीदा खिड़की के पास वाली कुर्सी खाली होती। वो जानता था कि सिया वहीं बैठती है। और सिया भी जान चुकी थी कि आरव हमेशा उसके सामने वाली कुर्सी चुनेगा। कभी उनकी नज़रें मिलीं, कभी मुस्कुराहटें, पर शब्द... कभी नहीं। बस किताबों के पन्नों की सरसराहट और दिल की हल्की धड़कनें ही उनकी भाषा थीं। एक दिन सिया नहीं आई। आरव ने घंटों इंतज़ार किया। फिर दूसरे दिन भी... और तीसरे दिन भी। लाइब्रेरी की वही कुर्सी अब खाली थी, जैसे कोई अधूरा अध्याय। कुछ हफ्तों बाद सिया लौटी — हाथ में वही पुरानी किताब, चेहरे पर वही शांति। आरव ने कुछ नहीं पूछा, बस मुस्कुरा दिया। सिया ने भी बस सिर झुका लिया और वही कुर्सी संभाल ली। उस दिन पहली बार दोनों ने एक पन्ना साझा किया — आरव ने किताब आगे बढ़ाई, और सिया ने चुपचाप पढ़ना शुरू किया। शब्द आज भी नहीं बोले गए, पर दिलों ने सब कह दिया। कभी-कभी मौन ही सबसे सुंदर प्रेम की भाषा होती है। उस शाम बारिश हो रही थी। लाइब्रेरी के बाहर पानी की बूंदें गिर रही थीं, और भीतर आरव अपनी किताब में खोया था। सिया सामने बैठी थी, पर आज उसके चेहरे पर एक अलग ही शांति थी — जैसे किसी निर्णय की थकान उतर आई हो। किताब के बीच सिया ने धीरे से एक कागज़ का पन्ना रखा, और उठते हुए बस इतना कहा — “आज आखिरी बार देर मत करना...” आरव कुछ समझ पाता, उससे पहले वो जा चुकी थी। आरव ने पन्ना खोला — उसमें सिया की सधी हुई लिखावट थी: “आरव, हमने कभी बात नहीं की, फिर भी तुमने मेरी हर खामोशी सुनी। शायद यही सच्चा प्यार होता है — जब शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती। मैं शहर छोड़ रही हूँ, पर तुम्हारे साथ बिताया हर मौन पल मेरे दिल में हमेशा गूंजेगा... अगर कभी बारिश में किताब की खुशबू महसूस हो, समझ लेना, मैं वहीं हूँ — तुम्हारे सामने वाली कुर्सी पर।” आरव की उंगलियाँ उस चिट्ठी पर थम गईं। बाहर बारिश अब तेज़ हो चुकी थी। उसने चुपचाप वही कुर्सी खाली छोड़ दी — जैसे वो किसी के लौट आने की उम्मीद में अब भी रखी हो। वक़्त बीत गया... लाइब्रेरी अब नई किताबों से भर गई, पर उस एक पुरानी कुर्सी पर अब भी कोई नहीं बैठता। कहते हैं, आरव रोज़ आता है — वहीं बैठता है, वही किताब खोलता है... और जब बारिश की बूंदें गिरती हैं, तो मुस्कुरा देता है — क्योंकि उसे महसूस होता है, सिया वहीं है। 💧❤️ न चिट्ठियाँ आईं, न कोई पैग़ाम गया, बस एक मुस्कान थी जो दिल के नाम गया। कभी बारिश में जब किताब भीग जाती है, लगे जैसे सिया फिर से पास आ गई। ☔📖 कुछ रिश्ते लफ़्ज़ों से नहीं, एहसासों से जुड़ते हैं, कभी न कहकर भी दिल से गुज़रते हैं। मौन में भी एक सुकून होता है, जहाँ दो रूहें चुपचाप मिलते हैं। 💖 *******श्वेता अग्रवाल ********
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