हवेली का बुलावा राजस्थान की तपती दोपहरी थी। दूर-दूर तक फैली रेत, सूखी झाड़ियाँ और वीरानी में खड़ी एक हवेली जिसे लोग "शापित चौखट" कहते थे। गाँव के बुज़ुर्गों के चेहरे पर डर साफ़ झलकता था। जब भी उस हवेली का नाम लिया जाता, वे कांप उठते। कहते थे "उस हवेली में कदम रखने वाला कभी लौटकर नहीं आया। वहाँ काला जादू अब भी ज़िंदा है।" लेकिन अन्वी, शहर की एक रिसर्च स्कॉलर, इन दंतकथाओं को सच मानने को तैयार नहीं थी। उसके लिए यह महज़ एक रहस्यमयी जगह थी, जिस पर शोध लिखना था। गाँव के बाहर खड़े एक बूढ़े ने उसे रोकने की कोशिश की "बिटिया, मत जा… वहाँ सिर्फ़ हवेली नहीं, अधूरी चीख़ों का कैदख़ाना है। तांत्रिक ने वहाँ जिनकी बलि दी थी, उनकी आत्माएँ आज भी भटक रही हैं।" अन्वी मुस्कुराई, मगर उसके मन में हल्की सिहरन दौड़ गई। शाम ढलते ही वह हवेली के विशाल दरवाज़े पर पहुँची। दरवाज़ा इतना भारी था कि सदियों से जैसे किसी ने उसे छुआ ही न हो। जैसे ही उसने हाथ रखा, दरवाज़ा खुद-ब-खुद चर्र-चर्र की आवाज़ के साथ खुल गया। अंदर कदम रखते ही ठंडी हवा का झोंका आया। हवेली का अंधेरा उसकी हड्डियों तक उतर गया। टूटी खिड़कियों से आती हवा से जाले हिल रहे थे। दीवारों पर धुंधली लाल लकीरें दिख रही थीं मानो किसी ने खून से लिखा हो। अन्वी ने गहरी सांस ली और धीरे-धीरे आगे बढ़ी। हर कदम के साथ ऐसा लग रहा था जैसे हवेली की दीवारें उसे घूर रही हों। अचानक, उसे एक हल्की सिसकियों की आवाज़ सुनाई दी। उसने टॉर्च घुमाई कोई नहीं था। पर फर्श पर गीले पैरों के निशान उभरने लगे… जो उसे हवेली के तहख़ाने की तरफ़ ले जा रहे थे। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई। उसने कदम बढ़ाए और सीढ़ियाँ उतरने लगी। तहख़ाने में अंधेरा और सन्नाटा था। हवा भारी हो गई थी। कोनों में जले हुए दीपक पड़े थे, और बीचों-बीच एक पुराना लोहे का संदूक रखा था। अन्वी ने काँपते हाथों से संदूक खोला उसमें एक मोटी, काली जिल्द वाली किताब थी, जिस पर सूखे खून के धब्बे थे। जैसे ही उसने किताब उठाई, उसकी रीढ़ में सनसनी दौड़ गई। किताब का नाम उभरा “रक्त साधना काला ग्रंथ” और तभी, हवेली की दीवारों से किसी ने धीरे से उसका नाम पुकारा… "अन्वी…" To be continued…....
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