बेघर की रातें

शहर की भीड़ और चमक-दमक के बीच, दो बेघर लोग रात गुजारते हुए जीवन की कठिनाइयों और छोटे-छोटे खुशियों के पल तलाशते हैं। यह कहानी उनके संघर्ष, उम्मीद और अनसुलझे सवालों की दास्तान बयां करती है।

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दैनिक प्रतियोगिता

: विजय सांगा
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