रामलाल एक मेहनती किसान था। उसकी छोटी-सी ज़मीन और परिवार ही उसकी दुनिया थी। हर साल वह खेती करता, अनाज उगाता और उसी से घर चलता। लेकिन पिछले कुछ सालों से मौसम ने साथ छोड़ दिया कभी सूखा पड़ता, कभी बाढ़ आ जाती। खेती में नुक़सान हुआ तो रामलाल ने गाँव के महाजन से कर्ज़ ले लिया। सोचा था “अगले साल फसल अच्छी होगी तो सब चुका दूँगा।” पर किस्मत बार-बार धोखा देती रही। महाजन रोज़ आकर ताने मारता “रामलाल! कब तक टालता रहेगा? ब्याज बढ़ता जा रहा है।” रामलाल का दिल दहशत से काँप जाता। धीरे-धीरे हालत ऐसी हो गई कि घर का सामान तक बिकने लगा। बच्चों की पढ़ाई छूट गई। पत्नी सावित्री अक्सर कहती “हमारा क्या कसूर? मेहनत तो करते हैं, फिर भी पेट भरने लायक अन्न नहीं।” रामलाल रातों को जागकर सोचता “ये कर्ज़ किसी दीमक की तरह है, जो हमें अंदर से खा रहा है। क्या इंसान मेहनत करने के बावजूद भी कभी आज़ाद नहीं हो सकता?” एक दिन गाँव के स्कूल में अध्यापक ने किसानों की सभा बुलाई। उन्होंने समझाया “कर्ज़ का बोझ सिर्फ़ रामलाल का नहीं, पूरे समाज का है। जब हम मिलकर सहकारी संस्था बनाएँगे, तब महाजनों पर निर्भर नहीं रहेंगे।” गाँव के लोग साथ आए। सभी ने थोड़ी-थोड़ी मदद की। मिलकर कर्ज़ उतारने की योजना बनी। धीरे-धीरे रामलाल फिर से खड़ा हुआ। उसने फसल उगाई, बच्चों को स्कूल भेजा और घर में फिर से खुशियाँ लौट आईं। सीख: कर्ज़ में दबा इंसान अकेले टूट जाता है, पर जब समाज साथ खड़ा हो जाए तो सबसे बड़ा बोझ भी हल्का हो जाता है। एकता और सहकार ही असली समाधान है।
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