रोजमर्रा की थकान

कितनी थकी हुई है उनकी रोज़मर्रा, जो रोटियाँ सेंककर, रोटी कमाने भी जाती है। पर कल की चिंता हमेशा कंधों पर रहती है। सुबह चूल्हे की आँच से तपकर, दोपहर दफ़्तर की फाइलों में उलझती है, और शाम को फिर वही थाली सजाती है, मानो उनका जीवन कभी ख़त्म न होने वाला चक्र हो। उनकी मुस्कान में छुपा दर्द, और आँखों में अनकहा संघर्ष, कोई नहीं जानता कि हर साँस में उन्होंने कितनी हिम्मत रखी है। हाथ जले, पैर थके, मन घबराया, फिर भी वो चलती है, हर रोटियाँ, हर मेहनत, उनके परिवार के लिए, उनके प्यार के लिए। ओ दुनिया, क्या कभी देखोगी? उनकी थकान के पीछे की ताकत, जो हर दिन अपने आप को भूलकर, दूसरों की जिंदगी सजाती है। सच्ची बहादुरी यही है, दुनिया के सामने अनजानी, पर अपने कर्मों से महान। For the brave hearts who work everyday 🌹🌹🌹

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कविता

: Anu
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