यह कविता प्रकृति और जीवन के बीच के गहरे रिश्ते को उजागर करती है। इसमें सूखती नदियों की पीड़ा को मानवीय संवेदनाओं से जोड़कर दर्शाया गया है। कविता बताती है कि कैसे मानव की लापरवाहियों—जंगलों की कटाई, जल का दुरुपयोग और प्रकृति के साथ खिलवाड़—ने नदियों को सूखने पर मजबूर कर दिया। यह केवल नदियों की नहीं, बल्कि जीवन की प्यास की कहानी है। कविता एक चेतावनी भी है और एक उम्मीद भी—अगर हम समय रहते संभलें और जल व प्रकृति का संरक्षण करें तो फिर से नदियां बहेंगी, जीवन हरा-भरा होगा और धरती पर मुस्कान लौट आएगी।
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