कचरे का बचपन

शहर की सबसे पिछली बस्ती… जहाँ न कोई गली साफ़ होती थी, न नाले सूखते थे, न बच्चों के लिए कोई खेल का मैदान था। वहीं, बदबू से भरे कूड़े के ढेर के बीच, एक दस साल का बच्चा रोज़ सुबह अपनी आँखें खोलता था। उसका नाम था कचरा। हाँ, यही नाम था उसका। माँ ने जन्म के वक़्त नाम कृष्णा रखा था, पर बस्ती वाले उसे हमेशा “कचरा” कहकर पुकारते रहे। धीरे-धीरे उसका असली नाम गुम हो गया और वो खुद भी अपनी पहचान भूल बैठा। घर? घर तो कहना भी मुश्किल था। टीन की चादरों, फटे टाट और टूटी लकड़ियों से बनाया एक छोटा-सा कोना। बरसात में छत से पानी टपकता, गर्मी में टीन की दीवारें तवे जैसी तपतीं। वहाँ माँ-बेटा रहते थे। माँ दिन-रात घर-घर जाकर बर्तन मांजती थी, और छोटा कचरा कूड़े के ढेर से प्लास्टिक, लोहे और काँच बीनकर बेचता। उसकी छोटी-सी हथेली में जब भी काँच की बोतल का टुकड़ा चुभता, वो चुपचाप खून पोंछ लेता और फिर से झुककर बीनने लगता। क्योंकि उसे पता था कि अगर बोतलें इकट्ठी नहीं होंगी तो रात को चूल्हा नहीं जलेगा। कचरे का बचपन कभी गुड़िया-गुड़िया या खिलौनों से नहीं खेला। उसका खिलौना था—टूटी चप्पल का पट्टा, जंग लगी गाड़ी की पहिया-रिम, या किसी अमीर बच्चे का फेंका हुआ टेडी बियर। वो अक्सर कूड़े के बीच से टूटी-फूटी चीज़ें उठाकर उन्हें जोड़कर खेलता। उसके चेहरे पर वही मुस्कान होती जो किसी अमीर बच्चे के महंगे खिलौनों से खेलने पर होती है। एक दिन कचरे ने कूड़े के ढेर में से आधा खाया हुआ बर्गर निकाला। उसने चारों तरफ देखा, फिर जल्दी से उसे अपने मैले कपड़ों से साफ़ किया और पेट में डाल लिया। उसकी आँखों में चमक आ गई। जैसे उसने कोई राजमहल की दावत पा ली हो। भूख ने उसके लिए गंदगी और स्वाद की पहचान मिटा दी थी। कचरा अक्सर सड़क पर बने सरकारी स्कूल की खिड़की से झाँकता था। अंदर बच्चे साफ़ कपड़े पहने, कॉपी-किताबों में लिखते। उसे लगता जैसे वो किसी और ही दुनिया के लोग हैं। वो खड़ा-खड़ा दीवार पर लिखी ए, बी, सी, डी देखता और उन्हें अपने मन में दुहराता। कभी-कभी वो टूटी हुई स्लेट उठाकर उस पर कोयले से लिखने की कोशिश करता। उसकी लिखावट टेढ़ी-मेढ़ी होती, लेकिन सपनों में साफ़-साफ़ अक्षर बनते थे। लोग उसे हर जगह धक्का देते। “ए कचरे, दूर हो बदबू आ रही है।” कभी कोई कहता, “हमारे बच्चों से मत खेल, गंदा हो जाएगा।” उसके कान इन बातों से भर गए थे। धीरे-धीरे वो बोलना कम कर दिया। वो जानता था कि उसके हिस्से में कोई दोस्त नहीं आएगा। एक दिन माँ ने उससे कहा “बेटा, तेरा नाम कचरा नहीं है। तू मेरा कृष्णा है। याद रखना, कचरा वो होता है जिसे लोग फेंक देते हैं… लेकिन बेटा, तू तो वो रतन है जिसे लोग पहचान नहीं पा रहे।” उस दिन कचरे की आँखों में पहली बार चमक आई। उसने सोचा “मैं सच में कोई और हूँ? सिर्फ ये गली, ये कूड़ा ही मेरी पहचान नहीं?” एक सामाजिक संस्था के लोग उस बस्ती में आए। उन्होंने बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया। शुरू में कचरा डरते-डरते वहाँ गया, लेकिन जब टीचर ने उसे “बेटा” कहकर बुलाया, तो उसके दिल ने अजीब-सी राहत महसूस की। धीरे-धीरे उसने अक्षर पहचानना सीखा, गिनती करना सीखा। एक दिन टीचर ने पूछा—“तुम्हारा नाम क्या है?” उसने धीमे स्वर में कहा “कचरा…” टीचर ने मुस्कुराकर उसके कंधे पर हाथ रखा“नहीं बेटा, तुम्हारा नाम कृष्णा है। याद रखना, अब कभी खुद को कचरा मत कहना।” उस दिन कचरे ने खुद को नए सिरे से देखा। अब वो रोज़ बस्ती से निकलकर पढ़ाई करने जाता। माँ बर्तन मांजकर लौटती तो उसे कॉपी-किताब के पन्ने दिखाता। भले ही उसकी झोली में अभी भी फटे कपड़े, भूख और तिरस्कार था लेकिन अब दिल में उम्मीद की ज्योति जल चुकी थी। कविता, कचरे का बचपन कचरे के ढेरों में सपने खोजता, नन्हा-सा बच्चा भूख से जूझता। टूटी चप्पल में खेल बनाता, रोटी के टुकड़े पे जीवन सजाता। लोग जिसे कहते हैं “कचरा” हँसकर, वो है किसी माँ का कृष्णा बनकर। अक्षर की लौ जब दिल में जली, अंधेरी बस्ती में रोशनी पली।

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