बेड़ियाँ

कहा गया तुम परिंदा हो, पर पंखों की डोर किसी और के हाथ बाँध दी गई। कहा गया  आसमान तुम्हारा है, पर बादलों की ओट से वही आसमान छिपा दिया गया। सिखाया गया  सही और गलत का फ़र्क, पर बोलने की ज़ुबान ही सील दी गई। हर पग में जंजीरें, जो दिखाई नहीं देतीं मगर हर उड़ान को ज़मीन पर गिरा देती हैं। जब भी चाहा मैंने क्षितिज को छूना, पकड़ लिया गया मेरे पंखों को मानो सपनों का कोई अपराध हो। ओ समाज! अगर सच में परिंदा बनाया है, तो आसमान भी दिखाओ, वरना ये झूठी आज़ादी बस एक ताले की चाभी है, जो कभी खोली ही नहीं जाती।       Anu✍🏻

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कविता

: Anu
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