मिट्टी का घर

मिट्टी का घर जब बस जाता, मन का आंगन महक उठ जाता। दीवारें भले हो टोकरियों जैसी, पर अपनापन उनमें रच-बस जाता। छप्पर टपकता बरसातों में, फिर भी सुकून दिलाता हर रातों में।धूप छने जब तिनकों से भीतर, सपनों का दीप जलाता मन संगीतर। न दरवाज़ों पर ताले भारी, न दीवारों पर दूरी की सवारी।

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कविता

: निर्मेश
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