वृद्धाश्रम की खामोशी

भोर की पहली किरण संग दमक उठी हरी पत्ती पर मोती-सी चमक उठी। मौन प्रकृति की ये अनमोल थाती, निर्मल भाव की कोमल आभा समाती। छोटा-सा कण, पर जीवन संदेश, पलभर ठहरे, फिर खो जाए विशेष। धूप लगे तो विलीन हो जाए, फिर भी मुस्कान विरासत छोड़ जाए। प्यासी मिट्टी को थामे एक सांस, जैसे कोई रखे दिल में विश्वास। नन्हीं-सी हस्ती, पारदर्शी दर्पण, जग का प्रतिबिंब, आत्मा का स्पंदन। न स्वार्थ, न अभिमान, बस समर्पण, क्षणभंगुर जीवन का सत्य दर्शन। हर बूंद हमें यही समझाती, क्षण को जी लो, समय है न्यारी। मानव को भी सीख सिखाती, सबका संग मगर आसक्ति रहित रहती। ओस की बूंद, शीतलता का गान, क्षणिक जीवन, पर अनंत सम्मान।

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दैनिक प्रतियोगिता

: निर्मेश
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