अपनापन एक ऐसा रिश्ता है जो दिल की गहराइयों से जन्म लेता है, न कि ज़बरदस्ती से थोपे गए बंधन से। जब कोई इंसान ख़ुद अपनी मरज़ी से हमारे साथ जुड़ता है, तो उसके हर लम्हे में एक अपनापन महसूस होता है। लेकिन जो हमारा बनना ही नहीं चाहता, उसे पकड़कर, रोककर, जबरदस्ती अपने पास रखने से क्या हासिल होगा? प्यार और रिश्तों की ख़ूबसूरती इसी में है कि वह स्वेच्छा से निभाए जाएं। जो दिल से साथ है, वो बिना कहे भी अपना होता है। और जो मन से ही दूर है, उसे हज़ार कसमें और वादे भी रोक नहीं सकते। आज अगर हमने किसी को ज़बरदस्ती अपना बना भी लिया, तो कल उनका मन कहीं और उड़ान भर जाएगा। क्योंकि अपनापन की जड़ें मजबूरी में नहीं, बल्कि सच्चाई और चाहत में पनपती हैं। इसलिए, रिश्तों को थामना है तो मोहब्बत और भरोसे के धागों से थामो, न कि ज़बरदस्ती की डोर से। क्योंकि जबरदस्ती का अपनापन कभी स्थायी नहीं होता, और सच्चा अपनापन बिना कहे भी हमेशा साथ रहता है।
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